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अपने हकों की ताबीज़ 
कही और बांध चुका हूं
इक ज़रा सी शरारत कर
ख़ुद को साध चुका हूं
सांसों की आह से
आरे तिरछे राह से
है सजग दिल की धड़कनें 
इरादों की चाह से..
थोड़ी मर्यादा का अवलंबन होगा
इश्क़ का इश्क की तरह उल्लंघन होगा
अपने साजों समान का ख़्याल रखना
हमारी बातों का यादों से बंधन होगा..


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