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कलम रुक सी गई है ।

SHAHAALAMSHAHAALAM July 11, 2022
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कलम रुक सी गई है मेरी।
शायद सियाही खत्म है।
या अल्फाजों की कमी आखिर कलम क्यू न रुके जब मोहब्बत ही खत्म हो गई है उनकी।

में एक मुद्दत हमराह बनकर साथ चला उसके ।
उसका सोना, जगना,सवेरा और साम की रंगीन मुलकाते ।
बातो ही बातो में मेरे कंधे पर सर रख के रोना फिर सोना ।
हां सब कुछ याद है मुझे ।
वो पूछते है कोन हो तुम ।

क्या दौर था ...?
जब मोहब्बत नई - नई थी।
नई कसमें नई वादे। नई थे तुम भी और पाक साफ थे इरादे हमारे।
बहुत वक्त गुजर गया ।शायद वो तस्वीर धुंधली सी हो गई ।

आवाज सुनकर भी नही पहचानते ।
एक दौर था किसी भी नंबर से करू और खामोश रहूं ।मेरी खामोशी से पहचान लिया करते थे ।

अब केसे बाय करू में उसकी बाते ।
वो कसमें वो वादे शरद मौसम की रंगीन रातें।
उसका आना मुस्कुराना, चेहरे से नकाब हटाना।
नजरे झुका कर चेहरा छुपाना ।जैसे अंधेरे में सम्मा जलकर बुझना । हर एक अदा कातिलाना थी।
केसे बाय करू में उसका खुश होकर सीने के लग जाना ।

उसका रूठ कर चले जाना ।जाते जाते रुक कर मुस्कुराना ।अब ये सारी तत्वीरे खाक हो हुई
जो लिखी थी उसने मुझे खत में तहरीरे।वो भी जल कर अब राख हो गई।।




                          Shahaalam.✍️

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