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बूढ़ा गाँव

Alok AnantAlok Anant January 19, 2023
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वो अपना बूढ़ा गाँव,
पीपल की छाँव,
अब मरने को है ।
खत्म हुआ सब,
बीमार हुआ गाँव ।
कमी विटामिन की तरह,
हो गई संस्कारों की ।
मधुमेह की तरह, 
बढ़ गई शहर की हवा ।
वो मिट्टी के मकान टूटे,
समय की भाग दौड़ में ।
अपनो का अपनापन छूटा,
रूपये की होड़ में ।
आए पक्के मकान,
खुल गई कई दुकान ।
गाँव शहर की ओर बढ़ा,
मगर गाँव की तरह
पीठ पीछे नहीं कोई खड़ा।
वो मिट्टी की सुगंध अब कहाँ,
शहर के नालों की गंध जहॉं ।
लोग भागने लगे सभ्यता की ओर,
मगर ये सभ्यता भी तो असभ्य हो गया ।
गाँधी कहते थे -
असली भारत गाँव में बसता है, 
मगर गाँव पर तो अब शहर हंसता है। 

' आलोक अनंत'

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