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Kumar VishwasPoetry1 min read

फिर एक.....दिसंबर निकल रहा है।

Kuldeep DwivediKuldeep Dwivedi December 28, 2021
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गुजरे वक्त की तहरीरें देकर चेहरे को
लम्हा लम्हा गुजर रहा है।
यादों के पनघट को जैसे 
सुबहो का सूरज निगल रहा है। 
फिर एक दिसंबर निकल रहा है।

कैद.......वक्त का रेशा रेशा 
बंद मुट्ठी से मेरी , 
पल पल झड़ रहा है....
चेहरे पर कुछ लकीरों का जमघट भी
अब आहिस्ता आहिस्ता बढ़ रहा है
फिर एक दिसंबर निकल रहा है।

उन्नीदी रातों से पूछो , हिसाब लगाने में बीती जो
बोझ अब दुनिया जहां की यादों का.....मन पर बढ़ रहा है
तारीखों की आंगन से उतर कैलेंडर 
दिसंबर के साथ भी चल रहा है
दर्ज करा तहरीर सारी.....फिर एक दिसंबर निकल रहा है।
.......Kd

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