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जब भी कभी मैं बड़े शहर में तनहा हुआ

मुझे तंग गलियों वाला अपना छोटा शहर याद आया।


जब कभी मैं था थका मादा और कोई न था पास बेसाख्ता मुझे बचपन में मां की गोद में रखा अपना सर याद आया।


यहां, वहां कहां -कहां रहे भटकते,पर जब भी हुई रात न जाने क्यों कर याद अपना घर आया।


जब जीस्त के आखिरी मुकाम पर पहुंचने को है कदम क्योंजो पूरे कर न पाए याद हर वो अधूरा सफर आया। 



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