वृद्ध मेघ's image
Poetry2 min read

वृद्ध मेघ

aktanu899aktanu899 May 15, 2022
Share0 Bookmarks 52 Reads0 Likes

एक कृशकाय वृद्ध मेघ

लेकर अल्पवृष्टि अपने अंतर में

भटकता धीरे धीरे गगन में

ऐसे बादल गतिहीन से, जैसे वृष्टि विहीन से ,

आस लगाए सूखी धरा के कितने भूखंड

कब मेघ से बूंदें झरेगीं

कब प्यास उनकी बुझेगीं ।


जलती ,सूखी ,प्यासी धरती की

प्यास कहां भला बुझती है

नभ में चमकती तड़ित से ,

नभ में ही इधर- उधर उड़ते, भटकते अम्बुदों से,

मात्र मेघों के मल्हार से।


प्यास धरा की मिटती तभी,

जब मिटा देते

अस्तित्व सम्पूर्ण अपना बादल कई,

प्यास धरा की

तृप्ति पाती तो बस है पाती

वर्षा की बूंदों की गिरती फुहार से।


क्या मेघ वो ,

जो भी है शेष

वृष्टि उसके अंतर में,

आस लगाई धरती के

किसी खंड पर बरस पायेगा।

क्या कर पायेगा तृप्त

किसी की भी प्यास को

क्या कर सकेगा पूर्ण

किसी नयन की आस को।


सोचता मेघ

क्या कर सकेगा पूरा

वो किसी एक भी आस को,

क्या ला सकेगा हास

वो किसी के भी अधरों पर,

क्या कर सकेगा प्रफुल्लित

एक भी हृदय उदास को,

या फिर हो जायेगा शेष

नभ से धरा की यात्रा में ही।


No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts