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विदा -कहे बिना एक भी शब्द

aktanu899aktanu899 May 28, 2022
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कान्हा चले गये तुम कहे बिना /

विदा के एक भी शब्द /

पर सोचती हूं मैं कभी आना तुम लौटकर यहां /निहारना उन सूने पथों को /

जिन पर पड़ी थी पग धूलि हमारी /

कभी निहारना तुम उन बंद वातायनों को/

जिन पर टकटकी लगाए /

तुम मेरी एक झलक देखने को रहते थे आतुर/ करना प्रतीक्षा नदी के उसी तट पर/

उसी सूनी जगह/

जहां हम मिलते थे प्रायः/

किया करती थी मैं पहरों प्रतीक्षा तुम्हारे आने की/ और करना अनुभव/

कैसी होती है प्रतीक्षा की पीड़ा/

कभी तुम उन वृक्षों की शाखों पर /

अकेले बैठकर देखना जहां तुम और मैं बैठते थे साथ /

और जानना कि क्या अर्थ होता है साथ छूटने का/ क्या अर्थ होता है ऐसे किसे के वहां न होने का/

जहां उसे होना चाहिए था /

जहां उसके होने की ऐसी आदत पड़ गई हो /जैसे अनुभव करना सांसों का उठना गिरना/ निहारना तुम कभी शून्य में व्योम/

देखना कभी अमावस की अंधेंरी रात का गगन /

और समझना कि

क्यों कुछ अनुपस्थितियां इतनी पीड़ादायी होती हैं /


क्यों इतना खालीपन दे जाती हैं/

सुनना कभी उन प्रस्तर खंडों पर बैठकर /

अकेले ही पुकारकर अपने लौटते स्वर की प्रतिध्वनियां/ जहां कभी हम सुना करते थे /

अपने समवेत स्वरों की लौटती प्रतिध्वनियां /

अपने उसी सूने कक्ष में करना कभी/

यूं ही कुछ अंतहीन प्रतीक्षाएं/

जहां छुप छुपकर हमने कितने पहर थे बिताए / कानों को लगाना द्वार पर सुनने को ऐसी आहटें /

जो ज्ञात हो कि आयेगीं नहीं/

तब तुम्हें संभवतः समझ में आए कि क्या होता है/ विदा में किसी से बिना कुछ कहे चले जाने का अर्थ/ क्या होता है किसी के हिस्से में /

अंतहीन प्रतीक्षा देकर चले जाने का अर्थ/

क्या होता है उससे सारे बंधन तोड़कर चले जाना/ क्या होता है स्वयं बंधनों से मुक्त हो जाना /

पर औरों को छोड़ जाना ऐसे ही त्यक्त सा/ 

जिन्हें बंधनों की में सुख की आदत हो जाती है/ और जो बंधनों से छूटने पर भी नहीं हो पाते मुक्त ।


2.क्यों होता है ऐसा जब हों मुक्त/ तब रहती है आकांक्षा बंधनों में प्रिय के बंधने की/जब हो बंधनों की बढ़ती वय /होने लगता है उसी प्रेम का क्षय/ स्ने

ह के वही बंधन सारे लगने लगते हैं पगों की बेंड़ियां/बंधनों से मुक्ति की बलवती होने लगती है आकांक्षा/मैंने सोचा था मैं नहीं करूंगी तुमसे ऐसा प्रेम/जो बोझ और बंधन लगेएक समय के पश्चात/कोई अधिकार भी न मैने मांगा कभी/ न ही चाहिए था कभी मुझे /मैं जानती हूं तुम्हारे पथ अलग होने ही थे/तुम्हारे लक्ष्य कुछ और हैं/तुम कहां हो सामान्य/तुमसे जुड़ी मैं /तुमने कहा सखि मुझे /ये संबंध ,ये संबोधन /संग तुम्हारे व्यतीत हर क्षण जैसे मेरे लिए /अब एक सुखद स्वप्न लगता था/तुम्हें नहीं होती होगी कोई पीड़ा/नहीं लौटती होंगीं /तुम्हारे मानस में अतीत की वो स्मृतियां /पर मैं तो सामान्य हूं/मुझे तो नहीं भूला/मुझे तो नहीं भूलता /तुम्हारे साथ बिताया एक भी पल/मेरी पीड़ाएं उस स्त्री की पीडा़एं /जिसे छोड़कर चला गया /उसका सबसे प्रिय प्रेम के उत्कर्ष पर/कभी न लौटकर आने के लिए।



 



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