सावन's image
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यह मेघ पावस ऋतु के,

यह पहली वृष्टि सावन की,

क्या बुझा पायेगी तृष्णा

धरा के अगन की ।


सावन की घटाओं में ऐसा क्या है

जो गीत इन पर इतने गाये गये,

क्या मेघ सावन के ही तो नहीं

राग मल्हार गाते हैं,

क्या इन्हीं बरसते मेघों से तो ,

नहीं होती मात्र धरती आह्लादित

अपितु शुष्क मन भी भींग जाते हैं ।


विरह सावन में अपने पी से

क्यों होता इतना कष्टदायी,

ये भेद तो बस वही जानते हैं

फुहारों से लगती अगन जिनके

एकाकी जीवन में, तन में,

सूने प्रतीक्षारत मन में।


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