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मेरे बाबूजी

aktanu899aktanu899 June 25, 2022
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पता नहीं क्या बात थी पर

अपने में रहते अक्सर सिमटे सकुचाये बाबूजी,

सारे दुख अपने सहेजें अपने तक

पूछो तो हंसकर टाल जाएं।

दो पैसे बचाने की खातिर

रिक्शा भी न करें

जून की कड़कती धूप में

मीलों पैदल चल जाएं।

अपने खेतों की मिट्टी से प्यार इतना,

धूप ,जाड़ा,बरसात न देखें

खेतों में जैसे मर खप जाए।

वैसे रहें चुप चुप से पर

कई बार बेमतलब की बातों पर

जोर जोर से ठहाके लगाएं।

अपने बचपन की बात सुनाते सुनाते

अक्सर भावुक हो जाएं।

औरों को कभी न छेड़े,

न उनके जीवन में टांग अड़ाएं,

पर अपने अधिकारों के लिए,

किसी से भी लड़ भिड़ जाएं।

अंतर में अपनों की खातिर

रखें कितना प्यार छुपाए

पर कभी प्रदर्शित न कर पाए।

बच्चों को डांटने का काम

अम्मा के हिस्से छोड़ा था,

बच्चों को कभी जोर से डांट न पाए।

हो गुस्सा अम्मा से तो

बस चुप हो जाएं,

घंटों न किसी से बोले न बतिआएं।

बिना मतलब पालते थे

कितनी अर्थहीन चिंताए

ऐसा लगता था

कंधे पर कितना बोझ रहते हैं उठाए।

चले गये जाने क्या- क्या

अपने मन में ही छुपाए

कहां किसी से खुलकर कुछ कह पाए

जीवन पूरा बिता डाला

चले गये उस पार

पर जीवन

जैसे जीना चाहिए था कहां जी पाए।

जो उन्होंने दिया

कहां मिला उनको उतना भी

जितना दिया उन्होंने हम सबको

अंशमात्र भी कहां हम दे पाए।


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