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गहन निर्जन के तम में डूबे सूने मंदिर की

सूनी ड्योढ़ी पर जैसे एक दीप जला जाताहै कोई ।


वर्षों से धूल से अटी पुरानी वीणा पर

जैसे जीवन का नया राग छेड़ जाता है कोई ।


वर्षों से बंद पड़े सूने से मन का

प्रवेश द्वार , कितने वातायन खोल जाता है कोई


सूनी सूनी सी पथराई आंखों में

सौ नव स्वप्न जगा जाता है कोई


पांव धरा पर ही रहने देता

पर मन को जैसे पंख लगा जाता है कोई ।


सीमाओं का किये बिना उल्लंघन

हर सीमाएं लांघना सिखला जाता है कोई ।


जिस दृष्टि से देखते हम जीवन

उस दृष्टि के पार देखना बतला जाता है कोई ।


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