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जुबां तक आई है

aktanu899aktanu899 April 8, 2022
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जाने क्या क्या दर्द सहे इस दिल ने

तब जाके ये दास्तां जुबां तक आई है।

शोरोगुल से घबराकर हम ही भागे थे

अब जाने क्यूं डराती ये तन्हाई है।

क्या गिला औरों से सीने में भड़कते छुपे शोलों का,

ये आग भी तो आखिर हमने खुद ही लगाई है।

यूं तो ख्वाब न था जीने का,अब क्यों ये बात चुभती है बीत सा गया सफर तब क्यों ये बात समझ में आई है।

कौन बांध सका है किसको भला बंधन में

सबने तो अपने पांवों में बेड़ी खुद ही पहनाई है। 


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