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जर्जर काया और नवल मन

aktanu899aktanu899 October 18, 2022
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जर्जर होती काया हर दिन

पल प्रति पल क्षय होती काया,

पर हो रहा जैसे नित नवल मन।

नवल स्वप्न पर देखते हैं नयन

नव कामनाओं का

अंतर में होता है प्रस्फुटन।

नव भाव जागते हैं

नव राग जागते हैं

नव प्रीत जागती है

जागते हैं अनुराग नये।

नव पथ बुलाते हैं

स्वागत के लिए आतुर बांहें पसार

श्वेत मैघ ,नील नभ पुकारते हैं

हिमाच्छादित शिखर धवल बुलाते हैं

लहराती नदियों का आकर्षण करता है आमंत्रित

उफनता सागर बुलाता है जैसे पुकार।

कितने अनसुने स्वर

कानों से आ-आकर टकराते हैं

कितने मौन बिन कहे

कितना कुछ कह -कहकर जाते हैं।

किन अधरों के मधुर गीत बुलाते हैं

कितने किनके शब्दों में पिरोंये भाव बुलाते हैं।

कौन नयन

किसके नयन देते हैं आमंत्रण

वर्जित कामना के पथों पर ।

किसके शब्दों से झलकता

आत्मा का अप्रतिम सौंदर्य,

कौन है

गरिमामय सौंदर्य की शक्ति का प्रतीक।

कौन सरलता,सहजता की प्रतिमूर्ति,

कौन लिपटा रहस्यों के आवरणों में,

कौन गढ़ता है नई प्रेरणाएं ।

चाहता है भटकना एक साथ

न जाने कितने पथों पर मन,

पर टूटते ही नहीं

ऐसे हैं कुछ अटूट बंधन

ढहती नहीं है अभेद्य काराएं।


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