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बुझे बुझे इंतिज़ार

aktanu899aktanu899 May 3, 2022
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दिल में दबी कितनी हसरतें

निगाहों में निहां कितने छुपे इकरार ।


पांवों को किन राहों की जुस्तजू

हाथ किन्हें छूने को हैं बेकरार।


कौन से ख्वाब हैं रुठे हुए

किन बातों पे दिल है शर्मसार।


मिटता ही नक्श छूटी हुई गलियों का

लौटता है मन जाने क्यों बार बार।


बसाकर अजब सी बेचैनियां

चाहता है दिल सुकून और करार।


खोयी खोयी सी निगाहों में

रह गये हैं बस बुझे बुझे से इंतिज़ार ।


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