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अपने जैसी परछाईं

aktanu899aktanu899 April 6, 2022
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हर निगाह में ढूंढ़ी कोई निगाह अपनी खातिर

हर राह पे ढूंढ़ी अपने जैसी कोई परछाईं।

दुनिया की भीड़ में भागते हम भी शामिल थे

क्या जाने क्यूं ,कैसे उभरी अक्सर तन्हाई।

क्या बतलाएं तुझको ऐ दिल, जिनसे

कभी मिले नहीं, क्यूं बेसाख्ता उनकी याद आई।

कौन बताये ये किस्सा, क्यों किसी अपने से बेगाने ने कभी कोई आस तोड़ी ,कभी कोई आस बंधाई।

कुछ ख्वाब सरीखी इस झीनी सी दुनिया में

दस्तूरों की परवाह कौन करे, कौन दे रस्मों की दुहाई।

कौन जाने, किस नादानी ने क्या क्या रंग दिखाया

दर्द जगाया किसके सीने में,किसके लबों पर हंसी आई।

किसे पता यहां किसकी सच्चाई,किसको किससे क्या उम्मीदें

किसने किसकी क्या बात बिगाड़ी क्या बात बनाई।


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