थंडी रात's image
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किसको सुनाऊँ दास्ता मेरी, क्या हो रहा अंदर ही अंदर युही...
छत पे जाके चाँद से बात करूँ कभी, 
तो वो भी बादलों में छिप जाता तभी...
तारों से बात कर ली कभी तो अधुरी बात पूरी करू कैसे,
अनगिनत तारों में से पहली रात का तारा ढुंढु कैसे...

ख्वाबों में ही सही आशियाने जो बसाए थे,
मुड़ के कभी तुम देख तो लेते...
मन की तरंगे जो लहरों सी थी कभी बहती,
अक्सर अब उनमे झील सी खामोशी क्यों रहती...

दिन कभी तो कभी रात,
मिट्टी में बैठे हुए अक्सर होती है ये बात...
बोल रहा हूं पर लफ्ज सुनायी क्यों नही देते,
लफ्ज मेरे हवाओं पे सवार क्यों नही होते...
मिट्टी तो उडती है हवा भी बहती है,
तो बस आवाज मेरी क्यों दबी दबी सी रहती है...

बैठा था कही रात में नजर जमाये दिये पे,
नजर हटायी दिया ना हटा आँखों के सामने से...
एहसास ये कैसा कोई तो बताये,
पीया तो पानी था फिर नशा मदिरा सा क्यों सताये...
पूछी ये बात साथी से तो साक़ी का पता दिया,
पूछा साक़ी से तो उसने एक प्याला और नींबू आधा कटा दिया...

ये नज्म खत्म होने को है,
फिर भी ना कोई इंसान ना कोई परछाई दिखी...
पतझड़ की थंडी रात थी,
उम्मीद सुनने वालों की अब नहीं थी...
उतने में कागज भी गीला हो गया,
मेरी आँखें अब थोडी सी नम जो थी...

जमे हुए हात सेंकने आखिर कागज भी जला दिया,
लपटों के साथ चिंगारियों को भी देख लिया...
चलो मेहमान मेरी महफ़िल में कोई तो आया,
चिंगारियों में ही सही लोगों को अपने पास जो पाया...

दिखता है क्या तुम्हे भी ऐसा कहीं किसी सुनसान रात,
या ये ख्वाबीदा लफ्ज मैने ही सीखें बयां करने अपनी बात

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