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जुर्म की दास्ताँ

akshay kandwalakshay kandwal August 22, 2022
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भीड़तंत्र के द्वारा किसी को भी न्याय दे देना, या बेगुनाहों को अफवाहों के दम पर भीड़ के द्वारा कुचलकर मार डालना, कविता में दर्शाया गया है........



यहां मौत का नाच है,  कटे सरों का ताज है 
जिंदगी सस्ती है, यहां मौत भी हंसती है, 
जान लेने वाले, छीन ले निवालें 
खून के प्याले, यह खून पीने वाले,

जुर्म की आग है, धधकती हुई राख है
बेरोजगारी का वार है, जुर्म एक हथियार है, 
यहां बढ़ती महंगाई है, छुपी हुई सच्चाई है, 
विद्रोह की आग ये किसने लगाई है, 

मैं भविष्य नहीं देखता, बस उसे समझता हूं 
समाज का बदलाव शब्दों से कहता हूं 
सब धोखेबाज है छुपे हुए राज है, 
जुर्म की आग से जली हुई लाश है, 

ये दंगे भड़काते, अपनों से लड़ाते, 
हमदर्दी जताते यह अपना बताते, 
यहां कत्लेआम है, गवाहों के भी दाम है 
न्यायपालिका हैरान है, इतने गुनाह है फिर भी वो माफ़ है ?

यहां पैसों की बोली में, चलती है गोली 
गुनाहों की होली में, लगती है बोली, 
मौत का सौदा ये होता है रोज, 
कोई मरता है रोज, और कोई बचता है रोज़,

मौत का सिलसिला ऐसे ही जारी रहेगा, 
इंसाफ की लड़ाई में, गुनाहों का पलड़ा भारी रहेगा, 
सहेगा तब तक तू, जब तक रहेगा, 
इस धरती में बोझ बनकर गुनाहों को सहता रहेगा, 
 कुछ ना कहेगा, बस चुप ही रहेगा, 
मौत का डर तुझे भी रहेगा 

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