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यूक्रेन-रूस विभीषिका और भारतीय चिकित्सा प्रबंधन : एक विमर्श

Akshay Anand ShriAkshay Anand Shri March 9, 2022
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वर्तमान समय में रूस और यूक्रेन के बीच संप्रभुता की लड़ाई चरम पर है। पूरा वैश्विक समुदाय इस अनावश्यक विध्वनकारी युद्ध से आहत है। समूची वैश्विक संस्थागत इकाई, जो सभी देशों की सहमति से विश्व कल्याण के लिए बनाए गए थे,इस विभीषिका को देखकर किंकर्तव्यविमूढ़ है। इस विध्वंसक विभीषिका ने समूचे विश्व का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है।


अभी-अभी दुनिया ने पिछले 2 साल से कोरोना महामारी की विभीषिका से अनगिनत स्वजनों को असमय कालकवलित होते देखा है। धरती पर शायद ही कोई ऐसा आदमी हो जिसने अपने परिचितों को इस महामारी में न खोया हो। ये वैश्विक आपदा में मरने वाले लोगों की सही गणना शायद ही किसी भी देश ने सही-सही सार्वजनिक की हो, कारण जो भी हो। कोरोना महामारी का असर थोड़ा बेअसर हुआ ही था कि रूस यूक्रेन के बीच संपूर्णता की लड़ाई ने प्रलयंकारी रूप ले लिया है। इस विभीषिका ने पूरा मानव समुदाय आहत है। इस युद्ध का परिणाम जिसके पाले आए लेकिन हर रोज मानवता घुट घुट कर मर रहे हैं। यूक्रेन से लाखों लोगों का पलायन जारी है, कारण है युद्ध से अपने स्वजनों के जानमाल की रक्षा के लिए किसी सुरक्षित जगह में पनाह। इसी बीच यूक्रेन में हजारों भारतीय (छात्र व व्यवसायी) नागरिक भी, जो वहां रह कर रोजगार व शिक्षा प्राप्त कर रहे थे उन्हें भी पलायन करना पड़ रहा है।


बता दें कि यूक्रेन में लगभग 16000 से अधिक केवल छात्र हैं जो ( अधिकतर) चिकित्सा शिक्षा व अन्य उच्च शिक्षा की पढ़ाई कर रहे थे। इस युद्ध से उन्हें भी वहां से पलायन को मजबूर किया है क्योंकि युद्ध भयंकर त्रासदी का रूप ले चुकी है। प्रशासनिक भवन, हवाई अड्डा, शिक्षण संस्थान, रिहायशी इलाका, किसी को भी निशाना बनाया जा रहा है अथवा बनाने का अंदेशा हैं। यूक्रेन में सभी व्यवस्था ने घुटने टेक दिए हैं। वहां चिकित्सा शिक्षार्थी, जिन्हें यातायात के साधन नहीं मिल पा रहे हैं वे 50-100 किलोमीटर या इससे भी अधिक की दूरी पैदल चलकर दूसरे देश के बॉर्डर पर पहुंच रहे हैं। वहां से भारत सरकार द्वारा मिशन गंगा के तहत सभी छात्रों को विमान से अपने देश लाया जा रहा है। लेख लिखने तक 16000 से ज्यादा छात्रों/नागरिकों को भारत लाया जा चुका है। इसमें अधिकतर चिकित्सा शिक्षार्थी हैं, कुछ अन्य उच्च शिक्षा के छात्र व नागरिक भी हैं जो वहां रोजगार के लिए गए थे।


इस पलायन ने पूरे देश का सबसे ज्यादा ध्यान चिकित्सा शिक्षा की ओर खींचा है। वर्तमान में हर राजनीतिक, गैर राजनीतिक महकमे में चर्चा का केंद्र बना हुआ है। हर जिम्मेदार नागरिक व सामाजिक चिंतक, संबंधित संस्थान से जुड़े विशेषज्ञ, उद्योगपति व शिक्षाविद सामाजिक चिंतक के सामने बस एक ही सवाल है कि चिकित्सा शिक्षा के लिए दूसरे देशों में पलायन का मुख्य कारण क्या है.? इसकी क्या वजह है.?



बताते चलें कि एक समय अतीत में तक्षशिला, विक्रमशिला, नालंदा, पुष्पगिरी जैसे विश्व प्रसिद्ध शिक्षण संस्थान का केंद्र रहा हमारा देश, यहां बहुत अधिक संख्या में विदेशी शिक्षार्थी शिक्षा ग्रहण करने के लिए आते थे क्योंकि यहां उपलब्ध शिक्षा की गुणवत्ता का पूरा विश्व लोहा मानती थी। लेकिन विदेशी आक्रांता व आजाद भारत की उदासीन शिक्षा व रोजगार नीति में शिक्षा व्यवस्था की दुर्गति कर दी। स्थिति यह हो गई है कि वर्तमान में देश के 11 लाख 33 हजार 749 छात्र विदेशों में उच्च शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं जबकि केवल 49,348 विदेशी छात्र ही हमारे देश में शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। यह आंकड़े ऑल इंडिया सर्वे ऑन हायर एजुकेशन 2021, मिनिस्ट्री ऑफ एचआरडी की वेबसाइट पर विस्तार से उपलब्ध है।


● देश मे चिकित्सा शिक्षा की वस्तुस्थिति ;


देश में चिकित्सा शिक्षा की स्थिति पर 10 दिसंबर 2021 को लोकसभा में पूछे गए प्रश्न संख्या 2209 के जवाब में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने बताया कि जहां2013-14 में कुल 387 सरकारी व निजी मेडिकल कॉलेज में 51348 MBBS की सीटें उपलब्ध थी वहीं 2001 में यह संख्या बढ़कर कुल 596 मेडिकल कॉलेज में 88120 MBBS की सीटें हो गई हैं। हाल ही में 9 नए कॉलेज को मान्यता मिलने से एमबीबीएस की कुल सीटों की संख्या 90825 हो गई है। कॉलेज की संख्या सरकारी व निजी दोनों है। देखें तो 2014 के मुकाबले एमबीबीएस की सीटों 72% की वृद्धि हुई है।



आर्थिक सर्वेक्षण2020-21 की रिपोर्ट के चैप्टर 5 में वर्तमान भारतीय चिकित्सा व्यवस्था पर रिपोर्ट के अनुसार विश्व स्वास्थ्य संगठन के आदर्श मानक प्रति दस हजार आबादी पर 44.5 स्वास्थ्य कर्मी की उपलब्धता निर्धारित की गई है जबकि भारत में इसकी संख्या मात्र 23 है जो न्यूनतम है, तथा वैश्विक मानक प्रति एक हजार की आबादी पर एक डॉक्टर के स्थान पर देश मे 0.74/1000 ही हैं और अन्य आंकड़े भी चिंताजनक है। ज्ञात हो कि देश के 0.74/1000 राष्ट्रीय हैं, यदि इन आंकड़ों को विभिन्न राज्यों के परिपेक्ष्य में देखेंगे तो स्थिति और भयावह है।



उपरोक्त सभी MBBS की सीटों पर नामांकन के लिए MCI Act 1956 में संशोधन कर वर्ष 2016 से अखिल भारतीय स्तर पर राष्ट्रीय पात्रता सा प्रवेश परीक्षा (NEET नीट) का आयोजन अनिवार्य कर दिया गया है और विदेशों में चिकित्सा शिक्षा प्राप्त करने वाले शिक्षार्थियों के लिए भी परीक्षा में क्वालिफिकेशन को अनिवार्य कर दिया गया। बताते चलें कि विदेशों में पढ़ाई के लिए नीट NEET में क्वालिफिकेशन के प्राप्तांक को 3 साल तक वैद्य कर दिया गया। NEET नीट की परीक्षा में पूछे गए 720 अंकों की परीक्षा में एक100-120 अर्थात 17 से 20% अंक लाने वाले अभ्यर्थी भी क्वालीफाई माने जाते हैं अर्थात कुल 180 प्रश्नों में कम से कम 25-30 प्रश्नों के सही जवाब देने वाले भी क्वालिफाइड।ऐसे सभी क्वालीफाड छात्र चिकित्सा शिक्षा मे दाखिले के लिए पत्र माने जाते हैं। विदेशों व देश में निजी चिकित्सा संस्थानों में बहुत से छात्र जो आर्थिक रूप से समृद्ध परिवार से संबंध रखते हैं वह दाखिला भी लेते हैं जबकि 600/720 अंक प्राप्त करने वाले छात्र जो आर्थिक रूप से समृद्ध नहीं हैं, सरकारी मेडिकल कॉलेज में चयन नही हो पाता है, वे एमबीबीएस में दाखिले से वंचित रह जाते हैं।


सरकारी मेडिकल कॉलेज की फीस काफी किफायती है जबकि निजी मेडिकल कॉलेज की फीस काफी ज्यादा है। 2016 के पहले ( NEET नीट लागू करने के पहले) औसत निजी मेडिकल कॉलेजों की फीस 4-9 लाख रुपये प्रति वर्ष के बीच होते थे हालांकि डीम्ड विश्वविद्यालय के निजी मेडिकल कॉलेजों की फीस तब भी 20-30 लाख रुपये प्रति वर्ष थे। लेकिन 2016 में NEET नीट की परीक्षा अनिवार्य कर देने के बाद निजी मेडिकल कॉलेज की फीस लगभग दोगुनी हो गई जिससे औसत निजी मेडिकल कॉलेज में शिक्षा का खर्च 40-60 लाख रुपये तथा डीम्ड विश्वविद्यालय के निजी मेडिकल कॉलेज की फीस 1-1.5 करोड़ रुपये हो गई।



देश में नई मेडिकल कॉलेज खोले जाने वह नए पुराने मेडिकल कॉलेज चलाने को लेकर कठोर नियम-कानून है। नियंत्रण, निगरानी व निरीक्षण की व्यवस्था है ताकि समुचित गुणवत्ता सुनिश्चित की जा सके हालांकि कुछ संस्थागत अपवाद भी बहुत है। जिसकी हालत व्यवस्था के अनुरूप नहीं पाई जाती है, कारण संरचना का आभाव, अध्यापके -उपकरण में कमी। इस सन्दर्भ में व्यवस्था सुदृढ़ीकरण के लिए राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग NMC की लगातार बैठक की जा रही है।



देश की परीक्षा इकाई NTA द्वारा उपलब्ध आंकड़ों की माने तो हर साल 14-16 लाख अभ्यर्थी चिकित्सा शिक्षा के लिए हर साल प्रवेश परीक्षा देते हैं जबकि जबकि सीट की उपलब्धता (वर्तमान में) 90000 (हो गई) है अर्थात एक एमबीबीएस सीट के लिए लगभग 18 - 19 अभ्यर्थी प्रवेश परीक्षा देते हैं। यह आंकड़े राष्ट्रीय है। यदि हम विभिन्न राज्यों की बात करें तो बिहार 37 अभ्यर्थी प्रति एमबीबीएस सीट, झारखंड 27/1, उत्तर प्रदेश 23/1, दिल्ली 38/1, मध्य प्रदेश 17/1, राजस्थान 27/1 है

जबकि सफलता दर 5% है यानी एक सौ अभ्यार्थी में केवल 5% ही सफल हो पाते हैं। यदि आबादी के हिसाब से देखें तो राष्ट्रीय आंकड़े प्रति लाख आबादी मात्र 6.1 एमबीबीएस सीट उपलब्ध है। राज्यों के आंकड़े देखें तो बिहार 1.7 एमबीबीएस सीट प्रति लाख आबादी, उत्तर प्रदेश 3.1/1लाख आबादी, झारखंड 2/1लाख आबादी, तमिलनाडु 18 प्रति लाख आबादी, कर्नाटक 14 प्रति लाख आबादी इत्यादि है, ये सभी आंकड़े एनएमसी के वेबसाइट पर देखा जा सकता है।



एक बात गौर करने वाली है की एमबीबीएस सीटों का वितरण देश में एक समान नहीं है। आंकड़ों की माने तो देश की कुल उपलब्ध एमबीबीएस सीट का 40% सीट दक्षिण के केवल 5 राज्यों में है। जबकि इन 5 राज्यों की आबादी देश की आबादी का मात्र 20% है और नीट की परीक्षा में इन 5 राज्यों से सम्मिलित होने वाले छात्रों की संख्या भी केवल 30% ही है। सभी आंकड़े एनएमसी की वेबसाइट पर विस्तार से उपलब्ध है।


● विदेशों में शिक्षा चिकित्सा शिक्षा की स्थिति ;


विश्व में कुल 152 देशों में चिकित्सा शिक्षा उपलब्ध है। जिसके मानक और प्रबंधन भिन्न-भिन्न है। सस्ती चिकित्सा शिक्षा प्राप्त करने की लालसा से भारत के अधिकतर छात्र जिन देशों का प्रमुखता से रुख करते हैं उनमें अफगानिस्तान, आर्मेनिया, बहरीन, बांग्लादेश बेलारूस, डोमिनिका, इथोपिया, जॉर्जिया, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, मलेशिया, मॉरीशस, नेपाल, नीदरलैंड, नाइजीरिया, ओमान, पाकिस्तान, फिलिपिंस, पोलैंड, रोमानिया, सेंट किड्स, सऊदी अरब, सेंट लूसिया, श्रीलंका, तजाकिस्तान, तंजानिया, यूक्रेन, रूस, बेलारूस, संयुक्त अरब अमीरात जैसे देश प्रमुख है। ऐसे देशों में सस्ती चिकित्सा शिक्षा देने के बदले शिक्षा की गुणवत्ता से भी समझौता किया जाता रहा है। सारा मामला सम्बंधित चिकित्सा शिक्षा प्रदाता देश की प्रबंधन, नियंत्रण, निगरानी व निरीक्षण का है। अधिकतर देशों में चिकित्सा शिक्षा के लिए न कोई प्रवेश परीक्षा आयोजित होती है, ना ही अभ्यर्थियों की नैसर्गिक प्रतिभा की पहचान की जाती है। शिक्षा का कोई मापदंड भी निर्धारित नहीं है ना कोई साक्षात्कार केवल बस सस्ते चिकित्सा शिक्षा उपलब्धता के कारण आसानी से नामांकन मिल जाता है। चिकित्सा संस्थान के अंदर भी अकादमिक शिक्षा का कोई वैज्ञानिक ढंग नहीं है, उत्कृष्ट पाठ्यक्रम का अभाव, अपर्याप्त प्रैक्टिकल, प्रेक्टिस के लिए नगण्य मरीज, अपर्याप्त उपकरण, अपर्याप्त शिक्षक, सुदृढ़ चिकित्सीय अवसंरचना का भी अभाव , मनमाने ढंग से बिना किसी मानक-प्रबंधन के जैसे-तैसे पढ़ाकर डिग्री प्रदान कर दी जाती है। हालांकि अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, आस्ट्रेलिया, इटली जैसे देशों के चिकित्सा शिक्षा काफी गुणवत्तापूर्ण और महंगी भी है। जहां उत्कृष्ट प्रबंधन, प्रयोगशाला, शिक्षक व अन्य आधारभूत संरचना व पाठ्यक्रम काफी गुणवत्तापूर्ण है।



विदेशों से एमबीबीएस डिग्री लेकर आने वाले शिक्षार्थी के लिए देश में प्रैक्टिस की मान्यता देने के लिए नेशनल बोर्ड ऑफ एग्जामिनेशन NBE द्वारा फॉरेन मेडिकल ग्रैजुएट एग्जाम FMGE पास करना अनिवार्य प्रावधान है। आपको जानकर हैरत होगी कि केवल 10 से 12% विदेशी शिक्षार्थी ही इस परीक्षा को पास कर पाते हैं यानी देश में प्रैक्टिस के लिए वैद्य हो पाते हैं। अब आप इन परीक्षार्थियों की गुणवत्ता का अनुमान खुद लगा सकते हैं। हालांकि कुछ देशों जैसे ब्रिटेन ऑस्ट्रेलिया कनाडा न्यूजीलैंड जैसे देशों से चिकित्सा प्राप्त करने वाले शिक्षार्थी को FMGE से छूट दी गई है क्योंकि वहां के चिकित्सा शिक्षा का स्तर काफी गुणवत्तापूर्ण है।

हाल ही में एनएमसी NMC इस पर विचार कर रही है कि विदेशों से चिकित्सा शिक्षा प्राप्त कर आए हुए छात्र के साथ देश के निजी चिकित्सा शिक्षा संस्थानों से डिग्री प्राप्त किये छात्रों के लिए भी परीक्षा ली जाएगी जिससे उसकी गुणवत्ता का सही आकलन हो सके कि देश में निजी चिकित्सा संस्थान द्वारा दिये चिकित्सा शिक्षा का स्तर कैसा है।


●शिक्षा चिकित्सा शिक्षा के लिए विदेशों में पलायन के मुख्य कारण ;


१. देश में MBBS की पर्याप्त सीटों की अनउपलब्धता प्रमुख कारण है। आबादी के हिसाब से प्रति लाख आबादी केवल 6.1 एमबीबीएस सीट ही उपलब्ध है और ये आंकड़े विभिन्न राज्यों की और भी चिंताजनक है।


२. यह बात बिल्कुल सही है कि जिस वस्तु की जरूरत और स्वीकार्यता जनमानस में बहुत अधिक हो, पर यदि उसकी उपलब्धता और आपूर्ति नहीं हो सके तो उसका मांगा होना लाजमी है। देश में सरकारी मेडिकल कॉलेजों में तो किफायती शुल्क पर चिकित्सा शिक्षा मिल जा रही है लेकिन निजी मेडिकल कॉलेज की फीस काफी अधिक है। हालांकि निजी मेडिकल कॉलेज में अत्यधिक शुल्क होने के कुछ व्यवहारिक कारण भी हैं, जैसे इन्हें सरकार की ओर से अब तक किसी प्रकार की वित्तीय सहायता नहीं मिलती है। कॉलेज डॉक्टरों के लगभग 5-7 करोड़ रुपए से ज्यादा सालाना वेतन पर खर्च करती है वह अन्य संसाधन-प्रबंधन पर भी। ऐसे में संस्थान सारे शुल्क और मुनाफे भी छात्रों से लेंगे। व्यवहारिक कारण जो भी हो, यदि स्वतंत्रता आकलन समिति बनाकर यदि शुल्क का मूल्यांकन किया जाय तो प्रति छात्र प्रति वर्ष 2-4 लाख रुपये से ज्यादा का खर्च नहीं आएगा। लेकिन चिकित्सा शिक्षा को मुनाफा कमाने का एक ठोस उद्योग बना दिया गया है। निजी संस्थान समय समय पर विभिन्न मद में शुल्क वृद्धि करती रहती है, जिसपर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं के बराबर है। लेकिन हाल में एनएमसी इस संदर्भ में ठोस नीति बनाने के लिए लगातार बैठक कर रही है जिससे चिकित्सा शिक्षा सस्ती और गुणवत्ता पूर्ण हो सके । वर्तमान समय में देश में 0.6-1.5 करोड़ रुपये एक MBBS की डिग्री हासिल करने में खर्च हो रहे हैं जबकि वहीं विदेशी विदेशों में कुछ देशों के संस्थानों को अपवाद स्वरूप छोड़ दें तो 20-25 लाख रुपए में डिग्री पूरी हो जाती है हालांकि उसकी गुणवत्ता पर हमेशा समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं।


३. देश में चिकित्सा शिक्षा के लिए ठोस प्रारूप है जैसे प्रवेश के लिए प्रवेश परीक्षा, गुणवत्तापूर्ण कार्मिक प्रबंधन इत्यादि जो विदेशों में (कुछ देश अपवाद स्वरूप) उपलब्ध नहीं है।


४. देश मे चिकित्सा शिक्षा की अकादमिक पाठ्यक्रम पर समय समय पर समीक्षा व लागू की जाती है जो विदेशों में नहीं है।


५. शैक्षणिक संस्थान के प्रबंधन की लगता ठोस निगरानी की जाती है जिससे निजी व सरकारी संस्थानों पर गुणवत्तापूर्ण शैक्षणिक प्रबंधन का दबाव बना रहता है, ऐसी व्यवस्था अधिकतर अन्य देशों में नहीं है।


६. देश में चिकित्सा शिक्षा प्राप्त करने के लिए एकल प्रवेश परीक्षा नीट NEET में ज600/720 प्राप्तांक वाले भी प्रवेश से वंचित रह जाते हैं वहीं विदेशों में जाने के लिए छात्राओं को केवल 100-120/720 प्राप्तांक भी काफी है और यह प्राप्तांक अगले 3 साल तक के लिए वैद्य भी माने जाते हैं। आर्थिक समृद्धि के बल पर छात्र विदेश जाकर सस्ती चिकित्सा शिक्षा प्राप्त कर लेते हैं, उसकी गुणवत्ता जो भी हो।


● चिकित्सा शिक्षा को उत्कृष्ट बनाने के सुझाव ;


१. चिकित्सा विशेषज्ञों की मानें तो चिकित्सा व्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए सकल घरेलू उत्पाद GDP का 6% खर्च चिकित्सा प्रबंधन विनिर्माण व अन्य समायोजन पर खर्च किया जाना चाहिए। वर्तमान में केंद्र सरकार जीडीपी का मात्र 2.5% ही खर्च कर रही है जो पहले 1.4 - 1.6% था। चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुरूप यदि जीडीपी का 6% खर्च किया जाता है तो हम चिकित्सा के क्षेत्र में विकसित देशों जैसे अमेरिका ब्रिटेन से भी आगे निकल सकते हैं।


२. देश की सरकारी मेडिकल कॉलेज एमबीबीएस की सीटों को बनाई जाए और नए कॉलेज खोलने के लिए नीति बनाई जाए।


३. निजी मेडिकल कॉलेज की शिक्षा शुल्क पर नियंत्रण के लिए ठोस नीति बनाई जाए जिससे अप्रत्याशित शुल्क वृद्धि पर रोक लग सके। जिससे चिकित्सा शिक्षा मुनाफे का व्यापार ना होकर एक उत्कृष्ट शिक्षण संस्थान रहे।


२. ऐसे केरियर काउंसलर जो देश के छात्रों को गलत व अधूरी सुझाव से दिग्भ्रमित कर विदेश में चिकित्सा शिक्षा के लिये प्रेरित करते हैं और विदेशी चिकित्सा संस्थानों के एजेंटों के लिए दलाल की तरह कार्य करते हैं, उसपर नियंत्रण की ठोस प्रणाली का बनाई जाए जिससे देश के छात्रों और पूँजी का पलायन रुक सके।


३. चिकित्सा शिक्षा प्रदाता छोटे देशों पर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने के लिए दबाव बनाया जाए कि चिकित्सा विज्ञान के निर्धारित मांगों को माने। ऐसा नहीं करने पर उन संस्थानों में भारतीय छात्रों को नहीं जाने देना या उसकी डिग्री को मान्यता नहीं देने की शर्त रखी जानी चाहिए।



“विद्यार्थियों को ऐसी तालीम दी जानी चाहिए, जिससे वे संसार के विभिन्न महान धर्मों के सिद्धांतों को आदर और उदारतापूर्ण सहनशीलता की भावना रखकर समझने और उनकी कदर करने की आदत डालें”


~ महात्मा गांधी, यंग इंडिया--06.12.1928.

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