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महिला अस्मिता : एक और सामाजिक क्रांति का सूत्रपात

Akshay Anand ShriAkshay Anand Shri January 3, 2022
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नारी अस्मिता और मूकदर्शक पुरुष समाज

वैदिक युग में नारियों का बड़ा ही पूजनीय स्थान था. विवाह के अवसर पर वधू को आशीर्वाद देने के लिए ऋग्वेद में जो मंत्र है, उसमें वधू से कहा गया है कि सास, ससुर, देवर और ननद की तुम साम्राज्य बनो. स्त्रियां तो गृहस्वामिनी तो होती ही थी, किंतु उनका कार्यक्षेत्र केवल घरों तक ही सीमित नहीं था. वेद की कितनी ही ऋचाऐं नारियों की रची हुई हैं. नारियों के प्रति अन्याय न हो, वे शोक न करें, न वे उदास होने पाए, यह उपदेश मनुस्मृति ने बार-बार दिया है ;

शोचन्ति जामयो यत्र विनश्यत्याशु तत्कुलम

न शोचन्ति तु यत्रैता वर्धते तद्धि सर्वदा ॥


जिस कुल में नारी शोक-मग्न रहती है, उस कुल का शीघ्र ही विनाश हो जाता है. जिस कुल में नारियाँ शोकमग्न नहीं रहती, उस कुल की सर्वदा उन्नति होती है.


यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:

यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफला: क्रिया:।

जहां नारियों की पूजा होती है, वहां देवता निवास करते हैं. जहां नारियों की पूजा नहीं होती, वहाँ के सारे कर्म व्यर्थ हैं.


वैदिक युग की इस शुभ परंपरा की अनुगूँज हम पुराणों में भी सुनते हैं.

नरं नारी प्रोद्धरति मज्जन्तं भववारिधौ॥

अर्थात संसार समुद्र में डूबते हुए नर का उद्धार नारी करती है.


य: सदार: स विश्वास्य: तस्माद दारा परा गति:॥

जो सब पत्नी कहे वही विश्वसनीय है पति-पत्नी नल की प्रगति होती है


भारतवर्ष के अंतिम सम्राट पृथ्वीराज चौहान की पराजय ( 1192 ई) के उपरांत मुगल शासनकाल के आरंभ होते ही सांस्कृतिक क्षरण का आरंभ बहुत तेज हुआ। इस्लाम के सांस्कृतिक आक्रमणों के परिणामस्वरूप धीरे-धीरे भारत पर मुगलों का साम्राज्य विस्तार होने लगा. मुगल शासनकाल के आरंभ होते ही अनेक कठोर नियम बनाये जाने लगे. लड़कियों का बचपन मे ब्याह होने लगा, शिक्षा से दूर हो गई, पर्दे का चलन थोड़ा-बहुत पहले से भी था, किंतु, यह प्रथा मुगल काल मे कुप्रथा में परिणत हो गई. सती प्रथा, जौहर व अन्य प्रथाओं का प्रादुर्भाव भी मुगल काल से ही आरम्भ हुआ था जो तत्कालीन समय मे नारी-अस्मिता के रक्षार्थ किये जाते थे, जो कालांतर में भयानक कुप्रथा का प्रचलन बन गई.


मुगलकाल में अंकुरित हुई नारी-शोषण की बीज के पेड़ बरगद के समान आज भी हमारे सामने अट्टहास कर अपना फल दे रहे हैं। कुछ प्रथाओं जैसे जौहर, सती-प्रथा, नारी-अशिक्षा व अन्य विभत्स प्रथा को हमारे पूर्व में हुए सामाजिक आंदोलन का संचालन कर हमारे महापुरुषों जैसे राजाराममोहन राय, दयानन्द सरस्वती, अरविंद, मोहनदास करमचंद गांधी, स्वामी विवेकानंद व अन्य कई मनीषियों ने दूर किया.


भारत आजाद हुआ, सभ्यतानोन्मुख समाज की स्थापना के कई प्रयास किये गये। परन्तु दुःख की बात है कि कुप्रथाएं तो समय के साथ विलुप्त हगई लेकिन नारी-शोषण की जो वृत्ति मुगलकाल में थी, वो आज भी हमारे समाज मे जीवंत हैं, जिसे देख कर उन्नत सभ्य समाज हर घण्टे-हर मिनट व्यथित होता रहता है।


नारी अस्मिता को तार-तार कर देने वाली घटनाएं हर मिनट हो रही हैं, जो सभी अपनी आंख को पत्थर करके विभिन्न संचार माध्यमों से देखने, पढ़ने और सुनने को मजबूर हैं, का ब्यौरा देना “मल के समुद्र” से एक बाल्टी मल निकलना होगा.


महिलाओं के शोषण की (प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष) इतनी घटनाएं, वैश्विक आंकड़े को छोड़ भी दें, अपने देश मे हो रही हैं, यदि उसकी सही गिनती की जाय तो, मुझे लगता है कि, गिनती पूरी होते-होते उतनी नई घटनाएं हो चुकी होंगी. महिलाओं के इस दुखद एहसास की तो अवलोकन हीं नही की जा सकती, कितनी शर्मिंदगी होती है एक सभ्य समाज को, प्रिय पाठक, इसकी कल्पना करिएगा.


वैश्विक आंकड़े को तो छोड़ ही दीजिये, तत्काल पूरे देश के भी आंकड़ों को थोड़ी देर के लिए छोड़ दीजिए, हम आपको केवल बिहार में महिलाओं की स्थिति के आंकड़ों ( 2017 से अक्टूबर, 2021 तक) को बताते हैं जिसे हाल ही में बिहार पुलिस मुख्यालय ने जारी किया है ;


★ दुष्कर्म के मामले :- 2017 में 1199, 2018 में 1475, 2019 में 1450, 2020 में 1274, 2021 में 1274 मामले


★ छेड़खानी के मामले :- 2017 में 1814, 2018 में 501, 2019 में 486, 2020 में 905, 2021 में 457 मामले


★ दहेज हत्या के मामले :- 2017 में 1081, 2018 में 1107, 2019 में 1120, 2020 में 1045, 2021 में 828 मामले


★ दहेज उत्पीड़न क2017--4873, 2018--3387, 2019--3556, 2020--2686, 2021--2967 मामले


★ घरेलू हिंसा के मामले :- 2017--4021, 2018--3958, 2019--4723, 2020--3946, 2021--2207 मामले.


यानी पिछले पाँच सालों में महिला शोषण के कुल 52,504 मामले दर्ज हुए, अर्थात (30 मामले प्रति दिन) एक घण्टे नहीं बीतते, राज्य के किसी न किसी थाने अथवा न्यायालयों में महिला-शोषण के मामले दर्ज हो जाते हैं. ये तो बात हुई उन मामलों की, जिसमे महिलाएं साहस कर अपने शोषण के विरुद्ध न्याय हेतु आवाज उठाती हैं, बहुत से मामलों में महिलाएं समाजिक अवहेलना या अन्य किसी भी से घुट-घुट कर जीती है या किसी अन्य भय- या प्रलोभनों से शोषण के विरुद्ध आवाज को दबा दिया जाता है.


ऐसे मामलों की गिनती असम्भव ही है, लेकिन एक अनुमान के मुताबिक, जितने मामले दर्ज होते हैं, कम-से-कम-कम उतने मामले तो दब ही जाते हैं, जिसे अप्रत्यक्ष मामलों की श्रेणी में रखा जाता है। अब प्रिय पाठकगन, आप अनुमान लगा सकते हैं, की हमारे समाज मे महिलाओं की क्या स्थिति है।


लेकिन अब मुखरता का दौर है, महिलाओं में शिक्षा का प्रसार हो रहा है, वे अपने हितों के प्रति जागरूक हो रही हैं, वे संगठित हो रही हैं, शोषण के विरुद्ध आवाज मजबूती से उठ रही है. हमारी प्रशासनिक व्यवस्थाओं में भी समुचित बदलाव देखने को मिल रहे हैं. विधायिका द्वारा कठोर कानून बनाये जा रहे हैं, शोषित महिलाओं के न्याय के लिए विभिन्न राज्यों में विशेष न्यायालय का गठन हो रहा है, कई मामलों में स्पीड ट्रायल के माध्यम से सजा भी दी जा रही है. इतने होने के बाद भी हमारे समाज मे महिलाओं के विरुद्ध शोषण की घटना कम होने का नाम नहीं ले रही, यह काफी चिंता का विषय है.


सामाजिक हितों के शुभचिंतक, युवाओं के प्रेरणादायक स्वामी विवेकानंद जी ने कहा था, भले ही सभी चौराहे पर पुलिस चौकियां खुलवा दी जाए, गली-मोहल्लों में न्यायालयों के गठन कर दिया जाए, जबतक हमारे विचार में परिवर्तन नहीं होगा, एक सभ्य समाज की स्थापना हो ही नहीं सकता. (नोट :- शब्द हु-ब-हु न भी हो सकते हैं, विचार यही थे)


अतः हमें यह महसूस हो रहा है कि अब पुनः एक सामाजिक क्रांति की जरूरत है जो जन-जन में जागृति लाये, जैसी अवधारणा हमारे वैदिक काल मे महिलाओं के प्रति थी, पुनः वही अवधारणा समाज में पुनः प्रतिष्ठित हो. और हाँ, ऐसी क्रांति की शुरुआत हम पुरुष हीं करें तो कदाचित ज्यादा प्रभावी और दीर्घकालिक परिणाम होंगे क्योंकि शोषक हममें से कोई पुरुष ही है.

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