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हमारे समय के बुद्धिजीवी

Akshay Anand ShriAkshay Anand Shri August 29, 2022
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कितना असभ्य हो चला है समाज...

शर्म नाम की कोई चीज नहीं रह गई, मूर्ख तो मूर्ख, पढ़े-लिखे साहित्यकार-इतिहासकार टाइप लोग भी पीछे नहीं..भविष्य के लिए कैसा समाज बना रहे हैं ये बुद्धिजीवी-विचारक.


समाजिक विसंगतियों को दूर करने के लिए सभ्य-शालीन-सटीक व प्रभावी अवरोध की भी कला होनी चाहिए, नहीं तो पढ़े-लिखे व अनपढ़ में क्या विभेद..


समाज में विसंगतियां सामाजिक व्यवस्था के शुरुआती से ही होती रही हैं, आज का समाज उसी तत्कालीन समाज में क्रमवार सुधार का फलस्वरूप है। वर्तमान सामाजिक विसंगतियों में (खुद को) तथाकथित समाज सुधारक (कहने वाले), कुछ अपवाद स्वरूप सज्जन को छोर दें,( क्योंकि अच्छे अथवा बुरे लोग समाजिक व्यवस्था से पूरी तरह खत्म नहीं होते ) तो समाज सुधार के नाम पर बड़ी-नग्न अभिव्यक्ति करने से परहेज नहीं करते, इससे समाज में सुधार हो न हो, विसंगतियों का और प्रसार ही हो जाता है, भई यदि आप समाज सुधार हेतु सभ्य सामाजिक स्वीकार्य तरीके को अपनाने में अक्षम हैं (या विसंगति का आनन्द लेते हैं अथवा उसकी आढ में खुद की भड़ास निकलते हैं ) तो आप रहने दीजिए, समाज खुद कोई न कोई हल निकाल लेगा जैसे बीज सड़ने के बाद खुद अंकुरित होकर नए पादप का रूप लेकर नव-सृजन करता है, उसी तरह। आप अपनी बेशर्म बौद्धिकता को रहने दीजिए।


समाजिक विसंगतियों का हल नग्नता ( वैचारिक, भाषाई अथवा व्यवहारिक ) कभी नहीं हो सकती, जख्में जख्मों को कदापि नहीं भरेंगीं, आग पानी से ही बूझेंगे, हिंसा का हल हिंसा से नहीं, अहिंसा ही एकमात्र स्थायी और दीर्घकालिक समाधान है, नग्नता को दूर करने के लिए खुद नङ्गे खड़े हो जाना नहीं।


यदि आपमें इतनी विमर्शनीय संवेदनशीलता नहीं तो आपका किताबी अध्ययन महज प्रपंच ही है,आपका किताबी ज्ञान कुतर्क के लिये है,समाजिक चर्मोत्कर्ष के लिए नहीं।

झुंड-के-झुंड युवा मिलेंगे आपको आदर्श मानने वाले,हम तो भर्त्सना ही करेंगे आपकी।


बहुत आसान है दूसरों की आलोचना करना, हंसी उड़ान, नीचा दिखाना और खुद को उत्कृष्ट साबित करते रहना लेकिन कठिन है समाज को निज-तप से अर्जित कर कुछ नए आयाम देना, जिस परिस्थितियों में समाज मे जिया, उससे उसे थोड़ा भी उत्कृष्ट बनाना।


एकबार सोचिए उन महापुरुष सामाजिक सुधारकों के बारे में जिन्होंने समाज के लिए अपना सर्वस्व अर्जित ज्ञान, तन-मन-धन न्योछावर कर दिया, जीया तो बस समाज के लिए और अंत मे अपना जीवन भी समाज के लिए अर्पित कर गए ( उदाहरण तो हमसे ज्यादा आपको ही ज्ञात होगा)। 


सोचिए, एक वो, कितने उदार थे और एक आप, कितने संकीर्ण, इतने की, जिस थाली में खाते हैं, उसे भी नहीं बख्शते।

अनगिनत किताबी अध्ययनोपरांत यदि समाज सुधार की आधारभूत नैतिकता की कमी ही रह गई (इसमें कोई नही बात नहीं, आदमी ही हैं, कुछ बातें विमर्श से फिसल ही जाती है) तो कम-से-कम जब कहीं असभ्यता/असामाजिकता दिखाई दे तो उसकी खेती मत करने लगिये, सस्ती लोकप्रियता के लोभ में।


ब्रह्मांड असीम व अनन्त है, एक मिल्की-वे गेलेक्सी में अनन्त तारे-ग्रह-उपग्रहों में छोटी सी हम सबकी पृथ्वी है, जिसमे एक भाग थल व शेष तीन भाग जल ही है, उसपर सात महाद्वीपों में एक एशिया है, उसमें छोटा सा अपना भारत ( वैश्विक धरती का मात्र 8.1% ) है, जिसमे असंख्य जीव व पेड़-पौधों के साथ 140+करोड़ नागरिक हैं, उसपर भाषाई-जातिगत-धर्म-सम्प्रदाय के आधार पर तमाम प्रकार की विविधता है, उसमें से आप अकेले मनुष्य हैं।


मुझे तो संशय व चिंता है कि आपज्यादा काबिल, महान बनने की कोशिश में कहीं के नहीं रहेंगे।

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