ग़ज़ल- आईना भी छिपा नहीं सकता's image
Poetry1 min read

ग़ज़ल- आईना भी छिपा नहीं सकता

आकिब जावेदआकिब जावेद June 9, 2022
Share0 Bookmarks 235 Reads1 Likes

#ग़ज़ल 


बोझ ग़म का उठा नहीं सकता।

दर्द  अपना  बता  नहीं सकता।


इश्क़  का  रोग  जो  लगाया है,

आईना  भी  छिपा  नहीं सकता।


ज़िंदगी  है तो  ग़म  मिलेंगे ही,

हौसलें को  डिगा  नहीं  सकता।


दर - ब - दर  ठोकरें  मिली सबसे,

मुफ़लिसी को भुला नहीं सकता।


जीना - मरना  मिरा  यहीं  यारो,

मुल्क़  को  छोड़ जा नहीं सकता।


रात  में  जाग - जाग  के रोया,

हाल- ए - दिल को बता नहीं सकता।


प्यार अनमोल है हिफ़ाज़त कर,

वर्ना ख़ुद को बचा नहीं सकता।


-आकिब जावेद

बाँदा,उत्तर प्रदेश

No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts