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अपना यहाँ कोई नहीं

सूरज यादवसूरज यादव November 11, 2021
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अपना यहाँ कोई नहीं
सब पराए से लगने लगे हैँ
कल तक जो मेरे साथ सुबह शाम गुज़ारते थे
बस वही अब मुझे खाने लगे है

बेखबर है हर कोई यहाँ
दुनिया के रिवाज़ों से
तू गलत मैं सही बस यही गुनगुनाने लगे है

मोहबत्त एक जाल है मन को बहलाने का
आखिर कौन अब साथ जीने-मरने की सच्ची कस्मे खाने लगे है 




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