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चाहतों की कश्तियाँ

Ajit kumar singhAjit kumar singh October 4, 2021
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चाहतों की कश्तियाँ

चाहतों की कश्तियाँ फिरती रही थी दर-बदर

तुझको मिल के यूँ लगा जैसे इन्हें तेरी खबर

कुछ नहीं मैं तेरे बिन तुझमें बसे सब ख़्वाब हैं

सुर्ख़ होंठों पर तेरे ठिठके मेरे अल्फ़ाज़ हैं ।।

लिपट के थाम मुझको रात ये ढलने को है

बुझ गये जो भीगे अरमां आज फिर जलने को है

कि ऐसी रात हरगिज़ फिर ना वापिस आयेगी

ख़ुशबू तेरी ज़ुल्फ़ों की फिर ना क़यामत ढायेगी ।।


मुझमें तू कुछ यूँ उतर जैसे जमीं पर रात है

इत्र तन का यूँ लुटा जैसे तू महकी बाग है

यूँ महक कि सुबह के ओस भी महके मिले

पृथक हो भौंरे कली से तेरे तन लिपटे मिले ।।

ढहने दे इन शर्म के शोरों भरे दीवार को

ज़र्रे-ज़र्रे से गुज़ारिश, मुझसे मिला मेरे यार को ।।

तू खड़ी ख़ुद को समेटे सदियों क़यामत ढ़ायी है

गले लग जा कि अब तो बारिशें गिर आई है

खोल ख़ुद को भीगने दे चाहतों की बारिशें हैं

तोड़ दे अपने हदों को ये अपने मिलन की साज़िशें हैं

क्या पता फिर बारिशें हों और तू ना भीग पाये

क्या पता अपने मिलन की फिर ना कोई रात आये ।।


बन नदी तू तोड़ दे अपने हदों की बाँध को

हसरत अगर हो तेरी तो मैं तोड़ लाऊँ चाँद को

जादू कर कुछ यूँ कि फिर ख़त्म ना ये रात हो

बस हमीं दो भीग पायें ऐसी कुछ बरसात हो

ऑंखों का पहरा हटा, कि मुझको अब आज़ाद कर

सूनी दिल की क्यारियाँ, तू बाग बन आबाद कर

खोल तन के आब को फिर चाँद भी सरमायेगा

तुझसे मिलने को जमीं पर आसमाँ झुक जायेगा ।।


कँपकँपाते होंठ तेरे राज जो ना कह सके

मौंज अरमां के निकल ज़ुल्फ़ों से घिर ना बह सके

क्या मिलन की रुत ये वापस लौट के फिर आयेगी

क्या तेरे चेहरे की रौनक़ फिर चाँदनी में नहायेगी

फिर तेरे अम्बर पे ना कोई मुस्कुराता चाँद होगा

रातें तो फिर भी मिलेंगी पर फिर ना ऐसा रात होगा ।।


कश्तियाँ अब डूबने को डूबते अरमान है

खोल दे अपने लबों को बोल क्या फ़रमान है

कुछ पलों की रात बाक़ी कुछ ही पल अब शेष हैं

क्या अभी भी तेरे मन में कोई और विशेष है ।।


हाय तूने फिर मेरी हसरतों को पहचाना नहीं

आग मुझमें कितना है इस ताप को जाना नहीं

मेरे मन के मृग ना दौड़ेंगे तेरी इस बाग में

अब नहीं जलना मुझे इस बेरुख़ी की आग में

अलविदा हुस्न तुझको साथ तू ना चल सका

दर्द आँखों में छुपा ली प्यार है ना कह सका

तेरे दिल का ये मुसाफ़िर फिर कहीं खो जायेगा

ना फिर ऐसी रात होगी ना ये मौसम आयेगा

तू नहीं मुझको मयस्सर इस जहां के ताज में

फिर मेरे नैंना जगेंगे वर्षों तेरी याद में ।।


Author- Ajit Singh

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