किसान भाई अपनी मेहनत का उचित मूल्य न पावे's image
Poetry1 min read

किसान भाई अपनी मेहनत का उचित मूल्य न पावे

Ajay Singh YadavAjay Singh Yadav January 6, 2023
Share0 Bookmarks 31 Reads1 Likes
सुबह होत खेतन को जावे,
शाम होत घर वापस आवे।
दिन भर खेतन में हल चलावे 
फिर भी अपनी मेहनत का उचित मूल्य न पा पावे।
खाद बिया का दाम हवाई 
दाम सुन किसान भाई का सिर जाई चकराई।
फिर भी किसान कुछ न बोलत भाई 
रुपैया इंतज़ाम कर खाद बिया घर लई जाई।
सोंच फसल तैयार होई , तब कर्जा निपट जाई 
जाई मारे कर्जा लईके , बऊनी हुई जाई ।
सर्दी , गर्मी , धूप और बरसात में कर मेहनत फसल ऊगावे
फसल काट खुश हुई जावे ।
जब फसल बेच घर वापस आवे 
लईके कर्जा और कर मेहनत बहुत पछतावे।
अपने आप को कर्जा में डूबा पावे 
किसान भाई अपनी मेहनत का उचित मूल्य न पा पावे ।
          - अजय सिंह यादव
 

No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts