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साँसों की जुबानी

Ajay JhaAjay Jha April 8, 2022
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गर साँसों की जुबानी
कह पता मैं कहानी
भर के उसाँसे छुप कर
छोड़ जाता मैं कहानी।


फिर वक्त की कड़ी से
मरहम न मांगता मैं
करने को सब बयां
हमदम न ढूढ़ता मैं।


हवा की हरकतों में
सोखी न ढूंढता मैं
झूमती सी डालियों में
वो हया न हेरता मैं।


अब मैं बिसर के इनको
बोलों का ले सहारा
कहता हूँ ये कहानी
इन भावों कि जुबानी।


अजय झा **चन्द्रम्**

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