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प्रायश्चित

Ajay JhaAjay Jha August 23, 2022
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आने वाली नस्लों को
हम क्या सौप कर जाएंगे
मानव विकास के नाम पर
बस अपना पाखंड दिखाऐंगे।


मीट्टी कहीं नही होगा
सब ईटों से पाटे जाएंगे
हरियाली के नाम पर
बस गमलों मे पेड़ लगाऐंगे।


हवा जो थी जीवनदायिनी
उसे जहरीली हम बुलाऐंगे
मुंह-मास्क बैग सिलीन्डर ले
ऑक्सीजन को चिल्लाएंगे।


बारिश होगी तब काली
खेतों का निशां नही होगा
नदी-तालो का नाम भुला
नालों का नामकरन होगा।


क्या दिन क्या रात
तब कोई भेद नही होगा
सुर्य चन्द्र और तारों का
फिर कोई अर्थ नही होगा।


समय रहे जो चेत सके
तो शायद कुछ बच जाये
अपने  किये कुकर्मों का
कुछ प्रायश्चित हम कर पाये।


फिर भी स्वार्थ नही माना तो
हम विनाश ही लाऐंगे
अपने पालक पोषक संग
सब-कुछ स्वाहा कर जाऐंगे।


अजय झा **चन्द्रम्**


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