नियति और कर्म's image
Poetry1 min read

नियति और कर्म

Ajay JhaAjay Jha August 1, 2022
Share0 Bookmarks 169 Reads2 Likes
कह्ते हैं पौरुष में बल है
जो मानवता का सम्बल है
पर नियति के आगे तो 
क्या बल है, क्या सम्बल है।

इक कठपुतलि हूं बन बैठा,
नियति के आगे झुका हुआ
मन है भिंचा, बुद्धि ऐंठा
लाचार और बेबस रुका हुआ।

हे देव! नहीं भूला मैं कभी
कि कुछ रहा नहीं बस में कभी
किस बात का थोंथा दंभ भरुं
जब स्वांस ही मेरे बस में नहीं।

खुद काल चक्र के आगे
देवत्व हुआ है नत्मस्तक
हो कर्ण या फिर कृष्ण
सब सीमित हुए यहीं तक।

पर फिर भी कर्मों को
हर पहर वहन करता हूं
जो कुछ भी आये आगे
उसका स्वागत करता हूं।

अजय झा **चन्द्रम्**


No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts