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खोखली चाहतें

Ajay JhaAjay Jha May 13, 2022
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इस तेज दौड़ में
बेतुके से होड़ में
बेबाक दौड़ते हैं
पल भर न सोचते हैं।


पैदा हुए थे इन्सान
पर् इन्सान नही रहे
खोखली सी चाहतों में
भेड़ बकरी बन गये।


रिश्तों को कर किनारे
बस लाभ ढूंढते है
दुसरो कि टीस मे
अपनी जीत देखते हैं।


कबसे कहे न जाने
भ्रस्टाचार गरीबी सहते
पर उफ्फ भी न करते
धर्य का परिचय हैं दिखाते।


अफसोस ये धैर्य
सम्बन्धो मे रख पाते
छोटी सी बात पे
रिश्ते न तोड़े जाते।


हर तिकड़म करके
पाले चाहे सब-कुछ
पर खुशी नही होगी
इस बेचैनी मे तुझे।


बात मान प्यारे
जरा धिरे हो ले
सच समझ कर
इन्सान सा जी ले।


अजय झा **चन्द्रम्**

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