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धर्म का दंभ

Ajay JhaAjay Jha April 23, 2022
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धर्म का हम दंभ भरे
मानवता को ठुकराते हैं
ईश्वर प्रदत्त मूल मन्त्र को
र्निल्लज हो झूठलाते हैं ।


जिस पंचतत्व से बने हम
उसने ना कभी कोई भेद किया
हमने रचे प्रपंच प्रिये और
जननी का हृदय ही भेद दिया।


घोला है जो ज़हर बैर का
उससे त्राण नहीं होगा
हम जियेंगे निश्चय पर
इसमें मान नहीं होगा।


अजय झा **चन्द्रम्**

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