अंतःकरण's image
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तुम मेरे अंतःकरण के
मान का आधार हो
हाँ दिखा सकता नहीं 
तुम सत्य निराकार हो।

हो तिमिर कितना घनेरा
या हो प्रपंचों  का बसेरा
तुम हि मेरे स्तम्भ हो
अंत और आरम्भ हो।

मैं मूढ़ हूँ या हूँ  गुणी
इसका ना कोई भान है
जो भी हूँ तुमसे हि हूँ
इस बात का बस ज्ञान है।

 अनजान हूँ अब भी
मैं हृदय के उदगार से
बस हेरता और हारता हूँ
इस जगत के सार से।

अजय झा **चन्द्रम्**

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