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मज़दूर पलायन

Aishwarya SinghAishwarya Singh May 14, 2022
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हम मजदूर हैं.. मज़बूर नहीं
हमारी मंजिल हमारी कोशिशों से दूर नही 
शहरों ने मुँह मोड़ लिया तो क्या
गाँव मे ये दस्तूर नहीं..

आज ख़ामोश होकर..
सबसे मायूस हो जा रहें है हम..
जा रहे है क्योंकी हमारी उम्मीदें टूटी हैं 
जा रहें है क्योंकी तुम्हारी हमदर्दी झूठी है

तुम्हारे घरों में लगा हमारा पसीना है 
तुम्हारे ख्वाबों को मिला हमारे हौसलों का नागिना है तुम्हारी उम्मीदों के हाथ हैं हम 
हर मुश्किल है आसान जो साथ है हम 
पर तुम हमे कुछ दे न पाये.. 
हम चले गए और तुम रोक न पाये.. 
जा रहे हैं क्योंकि खुदगर्ज़ी तुम्हारी देख न सकेंगे तुम्हारे एहसानों का बोझ सह न सकेंगे

तुम्हारी खरीदारी का मोलभाव थे हम 
बारिश में टपरी की चाय थे 
हम सालों हमारी मेहनत का मुनाफ़ा खाया है
 हमारी नींदों पर अपना हक़ जताया है 
पर हमारी औलादों को दो निवाला न दे सके 
कुछ दिनों के लिए हमारे पाव का छाला न ले सके जा रहे हैं क्योंकि ये मनमानी मंजूर नहीं
इस बीमारी में हमारा कुसूर नही

जा रहे हैं.. कोशिश है कि लौट के न आये 
गाँव को बंजर कर फिर शहर न सजाये
फिर न मेरे बच्चे भूखे हो
फिर न हालात यूं रूखे हो
जा रहे हैं शायद तुम्हें एहसास नही होगा 
हमारी कमी का आभास नहीं होगा 
पर तुम्हे याद रखेंगे हम 
अपनी दुआओ में आबाद रखेंगे हम..

Aishwarya..


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