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बहता पानी निर्मला

RaghavRaghav December 4, 2021
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बहता पानी निर्मला


थम जाने पर जैसे जल में काई जम जाती है वैसे ही ऐसा मन जो बदलाव और प्रगति से विमुख हो गया है, मलिन हो जाता है। आसक्ति, मोह और सुरक्षा की चाह के कारण मन बदलने से घबराता है। परंतु उसे यह नहीं पता होता कि यह सुरक्षा आत्मघातक है। 


हम दूसरों पर इतना आश्रित रहते हैं, इतना उन पर भरोसा रखते हैं। इतना अगर हम स्वयं के करीब हों तो हमारे बंधन कट जाएँगे। 


पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं 

स्वतंत्रता समान कोई निधि नहीं। परतंत्रता समान कोई दुःख नहीं। स्वतंत्रता हेतु अपना सर्वस्व अर्पित कर देना ही यज्ञ है। 


कोई नहीं जो तुम्हारे सुख में भागीदार होगा और कोई नहीं जो तुम्हारे दुःखों में साथ देगा। जागो, स्वप्न से बाहर आओ, और कितनी ठोकरें खाओगे, कुछ तो लाज रखो। 


बहता पानी निर्मला, बंधा गंदा होय।

साधु जन रमता भला, दाग न लागे कोय।। 

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