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इतनी बैचेनियाँ हैं इस मन में।

Afzal Ali AfzalAfzal Ali Afzal September 4, 2021
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इतनी बेचेनियाँ हैं इस मन में

रूह घबरा रही है अब तन में

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शोर बढ़ने लगा है धड़कन का

दर्द क्यूँ चीख़ता है धड़कन मे

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एक तुम ही न मिल सके हम को

और तो सब मिला है जीवन में

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पेड़ होते थे पहले, लेकिन अब

कुछ दीवारें उगी हैं आंगन में

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आयी मुद्दत के बाद लब पे हंसी

आयी मुद्दत में नींद नैनन में

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सोहबतें अपना क्या बिगाड़ेंगी

सांप पलते हैं ख़ूब चंदन में

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