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शब्दो में जीवन है

अबोध मनअबोध मन November 5, 2022
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“शब्दो में जीवन है”


मैंने जाने से पहले

देखना चाहा था

एक आख़िरी बार..

तुम्हारे चक्षुओं में..

जहाँ ठहरी हुई है

कोई बेबस सरिता..

हथेलियों से पीछे

धकेल उस जल

की उद्विग्नता को रोकती

तुम...

पर पीछे मुड़ने से

शायद टूट जाता

ये बांध और साथ ही

मेरे संयम का वो पुल

जिसे बनाने को स्वयं

पाषाण हुआ मैं..

सुनो.....प्रेम में

विनाशकारी नहीं होना मुझे!


जानती हो...


मैंने जाने से पहले

एक बार फिर दोहरानी

चाही थी वही

तुम्हारे माथे पर, मेरे

द्वारा अंकित स्पर्श की

पहली कविता!

और चाहा था मैंने

तुम्हारी डायरी में अंकित

एक स्वप्न की

वास्तविकता का

स्वाद तुम्हारे

अधरों पर रखना..!

सुनो.... किन्तु प्रेम में

व्यभिचारी नहीं होना मुझे।


ठीक कहते हैं

शब्दों में जीवन होता है।

यकीनन.. कविताएँ और

कहानियाँ इस कथन की

यथार्थता सिद्ध करती हैं

और इसलिए मैं

जाते–जाते रख आया

तुम्हारे सरहाने पर

कुछ छोटी कविताएँ।

...

#अबोध_मन

#गठरी_भर_प्रश्न



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