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सहजोबाई जी की अनन्य गुरु भक्ति

Abhishek TyagiAbhishek Tyagi August 1, 2022
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लीला धारी लीला करते, हरते भक्तों के दिल।
उमंग उठी हिय में हरि के, आएं सहजो से मिल।।
हुए प्रकट तुरंत ही, पास सहजो की कुटिया के।
बुहारी लगाने में थी लीन, नहीं देखा उसने सीस उठा के।।
प्रसन्न हुए आज देखते ही, निज मुख से फरमाया "सहजो"।
समक्ष तुम्हारे हम खड़े हैं ज़रा शीश उठा के तो देखो।।
ऋषि, मुनि, योगी, तपस्वी तरस्ते हैं जिन दर्शन को।
बड़े ऊंचे भाग हैं तेरे , हम आए हैं मिलने को।।
सहजो कहती प्रभो! अकारन ही आपने किरपा करदी है।
आपके दर्शन पाने की, नहीं मुझको कोई जल्दी है।।

आशा थी श्री प्रभु को, होगा सत्कार भारी आज।
सहजो किंतु नहीं छोड़ती, हाथों से बुहारी आज।।
पूछा प्रभु ने सहजो से, एसी कोन सी दौलत पाई है ?
दर्शन की भी नहीं है इच्छा, कर ली कौन सी कमाई है ?
तीन लोक चौदह भुवन की, कर ली मैने कमाई है।
पूरन गुरु के रूप में मैने, आपकी ज्योति पाई है।।
मुक्त कण्ठ से सहजो फिर, गुरु के गुनवाद गाने लगी।
समक्ष हरि सुनते रहे, वो आनंद में इठलाने लगी।।
कहा हरि ने ठहर सहजो, रीति मेरी ऐसी है।
जहां जाऊं दूं मै वर, आज भी इच्छा वैसी है।।

प्रभू आप मुझको दोगे क्या, आप तो स्वयं एक दान हो।
जिनको मेरे गुरु बक्शते एक महानतम वरदान हो।।
कहा प्रभु ने अच्छा ठीक, अब यहीं बात बनाएगी।
पहली बार तेरे घर हैं आए, अंदर नहीं बुलाएगी।।
इतना सुनकर कहा सहजो ने, केवल एक सिंहासन घर में है।
जिस पर मेरे गुरु बिराजते, नहीं कोई और आसन घर में है।।
आसन नहीं है घर के अंदर, नीचे ही बैठना होगा।
आए हो जब इस निर्धन के घर, इतना कष्ट तो सहना होगा।।
कहा प्रभु ने मुस्कुरा कर के, सहजो अंदर तो बुलाएगी।
बैठ जाएंगे हम प्रेम से जहां तू बैठाएगी।।

इतना सुनकर सहजो फिर, प्रभु को अंदर ले आती है।
बाहर से चाहे कुछ न कहती अंदर से भाग मनाती है।।
आज्ञा पाकर सहजो ने, नीचे ही आसन बनाया है।
प्रभु ने भी प्रेम के वश, भू को आसन बनाया है।।
बिराजते ही फिर से प्रभू ने, अपनी मौज दिखाई है।
ले आ सहजो आज प्रेम से, तूने जो भी भाजी बनाई है।।
ठहरो प्रभू कुछ देर मे ही, मेरे गुरुदेव यहां आएंगे।
भोजन तभी विस्त्रित होगा, पहले वे ही भोग लगाएंगे।।
तब फिर सहजो की कुटिया में, गुरु चरणदास जी आए हैं।
प्रभू को नीचे बैठा देख, वो भी ज़रा सकुचाए हैं।।

देखते ही गुरु को समक्ष, सहजो ने दणवत्त प्रणाम किया।
जो शेष रही थी दणवत्त प्रभू की, फिर उसको भी अंजाम दिया।।

                         (दोहा)
गुरु साहिब करि जानिए, रहिए शबद समाय।
मिलैं तो दणवत्त बंदगी, पल पल ध्यान लगाय।।

गुरु चरणदास जी को सहजो फिर भोजन कराती है।
मन ही मन में दिल ही दिल में, अपने भाग्य सराहती है।।
बैठे बैठे प्रभू जी भी, एसे वचन फरमाते हैं।
कोई सेवा हो हमारे लायक, चलो हम भी हाथ बटाते हैं।।
गर यही मौज है प्रभू आपकी, गुरुवर को चंवर डुलाइए जी।
गुरु सेवा का तनिक आप भी, पूरण लाभ उठाइए जी।।
है शाक्षी इतिहास तभी, प्रभू ने चंवर डुलाया है।
खुद होकर भगवान प्रभू, निज प्रभुता को भुलाया है।।
बाद गुरु के प्रभू जी को, भोग लगाया सहजो ने।
खिला कर फिर भोजन, शीतल जल पिलाया सहजो ने।।
करके लीला प्रभू जी ने, फिर वहां से प्रस्थान किया 
ऐसी सुंदर लीलाओ से, जन जन का उत्थान किया।।
 
                         (गुरुवाणी)
समुंद्र विलोर शरीर हम देख्या, इक वस्तु अनूप दिखाई।
गुरु गोबिंद, गोबिंद गुरु है , नानक भेद ना भाई।।

नोट:- कोई यह ना समझे कि सहजोबाई जी ने भगवान का अपमान किया था, एक परिक्षा थी जो उनके गुरु द्वारा ली गई थी यह जानने के लिए कि गुरु से कितने ऊंचे दर्जे का प्रेम उनके ह्रदय मे है।

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