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आज तमाम उम्र एक पल में जीना है मुझे

लगाकर सीने से हर ज़ख्म सीना है मुझे।।


मेरी आंखों में कोई साया न तुमको देख ले

दिल की गहराई के भीतर छुपाना है मुझे।।


सहलाके मेरे ज़ख्म को क्यों कुरेदते हो इन्हें

आज हर एक ज़ख्म पे मरहम लगाना है मुझे।।


आंखो में तेरी देखकर हर दर्द भुला देता हूं मैं

तेरी हर दवा का 'कर' चुकाना है मुझे।।


ज़माना कर ले चाहें कितनी भी साजिशें

एक उसी को बस उसी को पाना है मुझे।।


कभी जो कहते थे रहने दो ना होगा तुमसे

आज हर उस बन्दे को गलत बताना है मुझे।।


जिन्हें बहुत गुमान था अपने सागर होने का

आज हर इस तूफ़ानी सागर को सुखाना है मुझे।।


जिस जगह पे जाके वो मांगते हैं हर दुआ

आज उसी दर पे जाके सर झुकाना है मुझे।।



अभिषेक विश्वकर्मा

हरदोई, उत्तर प्रदेश


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