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तुम्हें में अपना रब समझकर

Abhay DixitAbhay Dixit January 15, 2022
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तुम जो नज़रों से कहती हो
में मन से उसे पढ़ लेता हूँ,
तुम्हें में अपना रब समझकर
मौन ही बातें कर लेता हूँ।।

तुम जब हवा बनकर चलती
में वृक्ष बन झूमता हूँ,
तुम्हें में अपना रब समझकर
हर झोंको पर शीश नवाता हूँ।।

तुम जब नदी बनकर वहती
में रेत सा थम जाता हूँ,
तुम्हें में अपना रब समझकर
हर क्षण स्पर्श पाता हूँ।।

तुम जब बसंत बनती
में पतझड़ बन जाता हूँ,
 तुम्हें में अपना रब समझकर
खुद में नयापन सा लाता हूँ।।

तुम जब शब्द बन जाती
में अक्षर बन जाता हूँ
तुम्हें में अपना रब समझकर
खुद को अर्थवान पाता हूँ।।

जब तुम मुझमें वस्ती
में तुमसा हो जाता हूँ,
तुम्हें में अपना रब समझकर
खुद में रब को पाता हूँ।।
~अभय दीक्षित

#प्यारसमर्पण




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