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तुम मेरे मन में ही मिले विराजे मोहन

Abhay DixitAbhay Dixit December 28, 2021
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मैंने तुमको मथुरा में खोजा मोहन,
तुम कहीं न मिले विराजे।।
मैंने तुमको बरसाने की गलियों में देखा मोहन,
तुम वहाँ भी न मिले विराजे।।

मैंने तुमको द्वारिका में खोजा मोहन,
तुम वहाँ भी न मिले विराजे।।
मैंने तुमको हर धाम में खोज मोहन,
तुम वहाँ भी न मिले विराजे।।

मैंने यज्ञ भी करवाये मोहन,
फिर भी तुम वहाँ न आये।।
हर ज्ञानी ज्योतिष को बुलाकर पूछा मोहन,
वो मेरे भाग्य में तुमको देख न पाये।।

मैंने तुम्हारे हर प्रेमी से पूछा मोहन,
बो भी पता न बता पाये।।
में थक हार कर बैठ गया था मोहन,
जो तुमको कहीं न ढूंढ पाया।।

तुम बड़े ही सहज निकले मोहन,
जो तुमको पहचान न पाये।।
जब मैंने अंतर मन में  देखा मोहन,
तुम मेरे मन में ही मिले विराजे मोहन।।
~अभय दीक्षित 

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