प्रेम - समर्पण's image
Love PoetryPoetry1 min read

प्रेम - समर्पण

Abhay DixitAbhay Dixit December 4, 2021
Share0 Bookmarks 125 Reads1 Likes
पहली बार जब हम मिले होंगे
न जाने कितने गुलाब खिले होंगे
यूँ तो हर वादा पूरा करना का था एक दूजे का
पर न जाने सफर में कितने वादे टूटे होंगे

सर्वस्य समर्पण किया था हमने
खुद से ज्यादा एक दूजे के लिए जिया था हमने
बो समय बड़ा ही अनमोल था हमारे लिए
लगता है सारा जीवन कुछ क्षणों में जी लिया था हमने

फिर अचानक वक्त का क्रूर बदलाव देखा
सारे वादे पर यूँ मुकरते हुए एक दूजे को देखा
जो पहले कभी  मुश्किल था एक दूजे के बिना
अब हमने एक दूजे के बिना ही देखा

हम कुछ करने वाले ही थे 
इससे पहले सब भांप लिया था
जब किसी एक की अलग होने की साजिश को
वक्त का फैसला मान लिया था

अंतिम बार यही कहना है
,ये सफर यही तक रहना है,
कब तक तुम और में साथ निभाते
जिंदगी भर जब जुदा ही रहना है।

~अभय दिक्षित

No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts