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तब जा के लिख पाया हूँ!

Abhay DixitAbhay Dixit March 29, 2022
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रात भर में तुमको रोया
तब जा के लिख पाया हूँ,
इसको गीत तुम जरा न समझना
में आंसू भर के लाया हूँ।।
अगर भीगे अंतर मन तुम्हारा
दिल बड़ा ही उदास हो जाए
तो मैं समझूँगा की नादानी में भी
बात समझदारी की कर आया हूँ
रात भर में तुमको रोया, 
तब  जा के लिख पाया हूँ।।
प्रेम सुना था पावन नदियों के किनारे
पर तुम मुझे बो प्रेमी न समझना
में तो अपने अँसुयों से ही
  एक नदी बना के लाया हूँ
रात भर में तुमको रोया, 
तब  जा के लिख पाया हूँ।।
जो देखते हो तुम इतने पाषाणों को
बो भी कभी किसी दिल के,
भगवान हुआ करते थे 
आज में सारे उन पाषाणों को
प्रेम की अश्रु धारा में बहाने आया हूँ
रात भर में तुमको रोया, 
तब  जा के लिख पाया हूँ।।
ये सूनने वालों गौर से सुन लो
अगर तुम अपनी आंख को गीला पायो
तो इनको आँसू न समझना
समझना कई पत्थरों को
दिल बना के आया हूँ
रात भर में तुमको रोया, 
तब  जा के लिख पाया हूँ।।
~अभय दिक्षित








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