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हम जा बैठे दूसरी नगरी में

Abhay DixitAbhay Dixit January 5, 2022
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हम जा बैठे दूसरी नगरी में,
या कहे ख्वाबों की पटरी में,
इतने यहाँ हमने भी जान लिया,
जैसे सागर भर जाता है गगरी में।।

बो दूसरी ही दुनिया थी हमारी,
जहाँ शून्य से शिखर की बातें थी,
ये दूसरी ही दुनिया में आ गए,
जहाँ बंद आँखों के सपनों की बाते हैं।।

जब हम कुछ और चले तो,
हमने यहाँ का राज जाना,
बूढ़े में हमने जवानी देखी,
जवानों में बुढ़ापे को पहचाना।।

यहाँ के हॉट बाजारों को देखा,
तो मन में बड़ा ही वेदना आई,
ईमानदार सत्यनिष्ठा को कुचलकर लोगो ने,
द्वेष इर्ष्या पाखंड वैर की बोली लगाई।।

फिर हम यहाँ की धर्माधारित चौपालों पर गए
वहाँ का अंदाज ही निराला देखा,
जो अपराधी  घोषित हो गए थे,
उनको  न्याय  व्यस्था  का   मुखिया  देखा।।

जब हम यहाँ और रुके तो,
परिकल्पना से बहुत ही ज्यादा देखा,
जो खुद वक्त और हालात के मारे थे,
उनको रातों रात धनी बनाने के ताबीज बांटते देखा।।

आँख खुली तो सोचा बुरा स्वपन था,
पर  बाहर देखा यही सत्य था,
हम डर हुए थे इतना ही देखकर,
लोगों ने कहा अपने अभी  देखा ही क्या था।।
~अभय दीक्षित

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