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सहजता की रचना

Aaditya Narayan ShakyaAaditya Narayan Shakya August 28, 2022
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सहजता की रचना


मन सूखा-सूखा, सच को पिरोए रे,

धूप की परछाई लिए,

बरसातों का पानी लिए,

बिलखती आग के बीच में,

माया, रूप रचाये रे,

चला तो रचयिता लेके रे,

लेकिन रस्ते में कई सारे को पिरोया रे,

मन भटका, तन भटका,

भूखी माया, कई-कई रूप लिए,

संसार को रचाई रे | | 


मैं तो आज जन्मा,

माया जन्मी, जन्म से पहले,

बांधे मुझे,

 कई-कई साल से,

यात्री की पोशाक में,

साफ़ जमीन पे,सामाजिक फसल के लिए,

सांसारिक बीज को,

माया बौना सिखाए रे,

 रचना रचाये रे | | 


मन सूखा-सूखा, सच को पिरोए रे,

धूप की परछाई लिए,

बरसातों का पानी लिए,

बिलखती आग के बीच में,

माया, रूप रचाये रे,

कहानियों की सीख ले के,

खुद की लड़ाई में,खुद का सहारा लिए,

ओढ़े चादर एक हौसले की,खुद का जन्म पिरोया रे | | 


रचना लिए रचयिता को,

सहजता से, माया का मुखौटा,

उतरवाया रे,

सूखे को निर्मलता में,

पिरोया रे,

आँधी, दुहुल में, 

अटल रचना लिए,

उम्मीद की रोशनी लिए,

जन्म को आकार दे के,

चेतन मन को सहज बनाया रे | |


©आदित्य नारायण शाक्य




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