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चलो क्यों न ऐसा करें

हरा रंग तुम ले लो 

रंग भगवा मेरा हुआ 


लहलहाती हरी घास

घने वन के छाँवदार पेड़ 

और पेड़ों से लिपटी हठीली बेलें 

बारिश में भीगे वह 

सौंधे हरे गीले पत्ते 

सब तुम्हारे 



उगते सूरज की अरुणिमा 

ढलती शाम की लालिमा 

सर्दी में जलते कोयले की तपस

रात के अँधेरे में 

जगमगाते जुगनू 

सब मेरे 


उस छोटे से गॉँव के किनारे 

कल-कल बहती वह नीली नदी

और सिपाही बन रक्षा करता 

वह गगनचुम्बी भूरा पर्वत 


शिलाओं पर उछलता फिरता 

वह नटखट सफ़ेद झरना 

सूखी धरती पर बरसने को आतुर

घुमड़-घुमड़ काले बादल 



झील में अपना प्रतिबिम्ब दिलखलाता

वह चम-चम चमकता चांदी सा चंद्रमा


यह तो न हरे हैं न भगवे

फिर यह किसको दें



खेतों में बहती

स्वाश देती वह ठंडी हवा 

और प्यास बुझाता 

जीवन देता निर्मल जल 


इनका तो कोई रंग ही नहीं है 

अब इनका क्या करें?


अरे, एक रंग और भी तो है 

लाल रंग  


वह रंग है उस रक्त का 

जो बहता तुम्हारी और मेरी रगों में 

जो सींचता तुम्हारे और मेरे हृदय को 


फिर क्या वह रंग हम दोनों का हुआ ?

क्या सभी रंग हमारे साझे हुए ?



सच है, कैसे निर्लज हैं यह रंग 

सभी के हैं और किसी के भी नहीं 

बेशरम रंग !




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