अंतिम सफर's image
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सुलझाने कि जिद में थोड़ी और उलझ सी जाती है
दिन महीने साल मे ये जिंदगी थोड़ी बीती सी जाती है
इक आहट सी लगी रहती है बीती किसी श्रेष्ठता की
बस उसी को लिए इंतजार रहता है हर शाम को सुबह का और हर सुबह को शाम का
इसी मैं जिंदगी बीती सी जाती है

फिर मुझे लगता है इस भागी सी जिंदगी मे एक ठहराव जरूरी है
पर मैं तो वही ठहरा हूं ना, जहां खो दिया था खुद को कई बरस पहले
मुझे अब वो दिन, बरस याद नहीं है
हाँ पर जब कभी आंखे मूंदता तो अक्सर दिखती है
एक अंधेरी वीरान सड़क ,लिए चौराहे एक के बाद एक
दिशाविहीन पाकर जब बैठता हुं किसी चौराहे पर
तो आभास होता जैसे हो कॉलेज का पहला दिन और चौराहा
पीछे देखता पर लगता है, बीती सड़कों पर दीए जलाए बड़ी दूर से आया हूं
किन्ही पथिको के लिए इक राह भी बनाकर आया हूं
पर जैसे ही दीए की रोशनी, गर्माहट मुझे तक पहुंचने को होती है
आगे पसरा अंधेरा उसे खा जाता है|

मैं फिर चौराहे पर खड़ा होता हूं , अबकी बार किसी जुगनू की तलाश में
मै अब अपनी हड्डियो को और नहीं जला सकता
जलाऊं भी तो कहां पहुंचने को, क्या बनने को ?
किस खोखली रोशनी, शहर, राष्ट्र का हिस्सा होने को?
वो जो बैठे ऊंचे शिखरों पर कहते विकसित बताते खुदको rational
है खड़े लाशों के ढेर पर, हर रोज नयी कब्र सजाते
बनाते, मिटाते warlords, हथियार संग मानवता बेचते
न जाने कैसे चैन की नींद सो जाते है

शायद इसलिए बनना होगा भारत को फिर विश्व गुरू
पर कहां से लाओगे वो राजा राम सा
जब राम नाम पर राजनीति होती, हजारों मार दिए जाते है
पर अपनाता ना कोई उनके आदर्श , व्यक्तिव को
बस सत्ता मद में चूर रहता, कहने को करता नेतृत्व शोषित, पिछड़ों का
पर वादे झूठे साबित होते, नियति होती कमज़ोर की शोषित होना 
गरीबी लूटती बचपन, चिकित्सा के अभाव मे मरते लोग
शिक्षित भी ढूंढता नौकरी, दिखाता करतब सड़कों पर
इस पर सत्ता और पूंजीवाद करता अट्टहास

तब लगता है इन राहों पर चलने से अच्छा ही था खुद को कहीं खो देना
पर बीती श्रेष्ठता की कसक उद्विग्न रहती है अपना स्वरूप पा लेने को
खोजती रहती है चौहरो पर एक दौड़ या ठहराव को
और इसी बीच जिंदगी बढ़ती जाती है अंतिम सफर की ओर |

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