Tagged: Suryakant Tripathi Nirala

अभी न होगा मेरा अन्त – सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला” 0

अभी न होगा मेरा अन्त – सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

अभी न होगा मेरा अन्त अभी-अभी ही तो आया है मेरे वन में मृदुल वसन्त- अभी न होगा मेरा अन्त हरे-हरे ये पात, डालियाँ, कलियाँ कोमल गात! मैं ही अपना स्वप्न-मृदुल-कर फेरूँगा निद्रित कलियों...

जागो फिर एक बार – सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला” 0

जागो फिर एक बार – सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

जागो फिर एक बार! प्यार जगाते हुए हारे सब तारे तुम्हें अरुण-पंख तरुण-किरण खड़ी खोलती है द्वार- जागो फिर एक बार! आँखे अलियों-सी किस मधु की गलियों में फँसी, बन्द कर पाँखें पी रही...

केशर की कलि की पिचकारी – सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला” 0

केशर की कलि की पिचकारी – सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

केशर की, कलि की पिचकारीः पात-पात की गात सँवारी । राग-पराग-कपोल किए हैं, लाल-गुलाल अमोल लिए हैं तरू-तरू के तन खोल दिए हैं, आरती जोत-उदोत उतारी- गन्ध-पवन की धूप धवारी । गाए खग-कुल-कण्ठ गीत...

ख़ून की होली जो खेली – सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला” 0

ख़ून की होली जो खेली – सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

युवकजनों की है जान ; ख़ून की होली जो खेली । पाया है लोगों में मान, ख़ून की होली जो खेली । रँग गये जैसे पलाश; कुसुम किंशुक के, सुहाए, कोकनद के पाए प्राण,...

खेलूँगी कभी न होली –  सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला” 0

खेलूँगी कभी न होली – सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

खेलूँगी कभी न होली उससे जो नहीं हमजोली । यह आँख नहीं कुछ बोली, यह हुई श्याम की तोली, ऐसी भी रही ठठोली, गाढ़े रेशम की चोली- अपने से अपनी धो लो, अपना घूँघट...

खेलूँगी कभी न होली / सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला” 0

खेलूँगी कभी न होली / सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

खेलूँगी कभी न होली उससे जो नहीं हमजोली । यह आँख नहीं कुछ बोली, यह हुई श्याम की तोली, ऐसी भी रही ठठोली, गाढ़े रेशम की चोली- अपने से अपनी धो लो, अपना घूँघट...

केशर की कलि की पिचकारी / सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला” 0

केशर की कलि की पिचकारी / सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

केशर की, कलि की पिचकारीः पात-पात की गात सँवारी । राग-पराग-कपोल किए हैं, लाल-गुलाल अमोल लिए हैं तरू-तरू के तन खोल दिए हैं, आरती जोत-उदोत उतारी- गन्ध-पवन की धूप धवारी । गाए खग-कुल-कण्ठ गीत...

अभी न होगा मेरा अन्त – सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला” 0

अभी न होगा मेरा अन्त – सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

अभी न होगा मेरा अन्त अभी-अभी ही तो आया है मेरे वन में मृदुल वसन्त- अभी न होगा मेरा अन्त हरे-हरे ये पात, डालियाँ, कलियाँ कोमल गात! मैं ही अपना स्वप्न-मृदुल-कर फेरूँगा निद्रित कलियों...

जागो फिर एक बार – सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला” 0

जागो फिर एक बार – सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

जागो फिर एक बार! प्यार जगाते हुए हारे सब तारे तुम्हें अरुण-पंख तरुण-किरण खड़ी खोलती है द्वार- जागो फिर एक बार! आँखे अलियों-सी किस मधु की गलियों में फँसी, बन्द कर पाँखें पी रही...

ख़ून की होली जो खेली – सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला” 0

ख़ून की होली जो खेली – सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

युवकजनों की है जान ; ख़ून की होली जो खेली । पाया है लोगों में मान, ख़ून की होली जो खेली । रँग गये जैसे पलाश; कुसुम किंशुक के, सुहाए, कोकनद के पाए प्राण,...

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