Tagged: Sumitranandan Pant

जीना अपने ही में – सुमित्रानंदन पंत 0

जीना अपने ही में – सुमित्रानंदन पंत

जीना अपने ही में… एक महान कर्म है जीने का हो सदुपयोग… यह मनुज धर्म है अपने ही में रहना… एक प्रबुद्ध कला है जग के हित रहने में… सबका सहज भला है जग...

यह धरती कितना देती है – सुमित्रानंदन पंत 0

यह धरती कितना देती है – सुमित्रानंदन पंत

मैंने छुटपन में छिपकर पैसे बोये थे, सोचा था, पैसों के प्यारे पेड़ उगेंगे, रुपयों की कलदार मधुर फसलें खनकेंगी और फूल फलकर मै मोटा सेठ बनूँगा! पर बंजर धरती में एक न अंकुर...

विजय – सुमित्रानंदन पंत 0

विजय – सुमित्रानंदन पंत

मैं चिर श्रद्धा लेकर आई वह साध बनी प्रिय परिचय में, मैं भक्ति हृदय में भर लाई, वह प्रीति बनी उर परिणय में। जिज्ञासा से था आकुल मन वह मिटी, हुई कब तन्मय मैं,...

चींटी – सुमित्रानंदन पंत 0

चींटी – सुमित्रानंदन पंत

चींटी को देखा? वह सरल, विरल, काली रेखा तम के तागे सी जो हिल-डुल, चलती लघु पद पल-पल मिल-जुल, यह है पिपीलिका पाँति! देखो ना, किस भाँति काम करती वह सतत, कन-कन कनके चुनती...

वायु के प्रति – सुमित्रानंदन पंत 0

वायु के प्रति – सुमित्रानंदन पंत

प्राण! तुम लघु लघु गात! नील नभ के निकुंज में लीन, नित्य नीरव, नि:संग नवीन, निखिल छवि की छवि! तुम छवि हीन अप्सरी-सी अज्ञात! अधर मर्मरयुत, पुलकित अंग चूमती चलपद चपल तरंग, चटकतीं कलियाँ...

आ: धरती कितना देती है – सुमित्रानंदन पंत 1

आ: धरती कितना देती है – सुमित्रानंदन पंत

मैने छुटपन मे छिपकर पैसे बोये थे सोचा था पैसों के प्यारे पेड़ उगेंगे , रुपयों की कलदार मधुर फसलें खनकेंगी , और, फूल फलकर मै मोटा सेठ बनूगा ! पर बन्जर धरती में...

गंगा – सुमित्रानंदन पंत 0

गंगा – सुमित्रानंदन पंत

अब आधा जल निश्चल, पीला,– आधा जल चंचल औ’, नीला– गीले तन पर मृदु संध्यातप सिमटा रेशम पट सा ढीला। … … … … ऐसे सोने के साँझ प्रात, ऐसे चाँदी के दिवस रात,...

महात्मा जी के प्रति / सुमित्रानंदन पंत 0

महात्मा जी के प्रति / सुमित्रानंदन पंत

निर्वाणोन्मुख आदर्शों के अंतिम दीप शिखोदय!– जिनकी ज्योति छटा के क्षण से प्लावित आज दिगंचल,– गत आदर्शों का अभिभव ही मानव आत्मा की जय, अत: पराजय आज तुम्हारी जय से चिर लोकोज्वल! मानव आत्मा...

याद – सुमित्रानंदन पंत 0

याद – सुमित्रानंदन पंत

बिदा हो गई साँझ, विनत मुख पर झीना आँचल धर, मेरे एकाकी आँगन में मौन मधुर स्मृतियाँ भर! वह केसरी दुकूल अभी भी फहरा रहा क्षितिज पर, नव असाढ़ के मेघों से घिर रहा...

सांध्य वंदना – सुमित्रानंदन पंत 0

सांध्य वंदना – सुमित्रानंदन पंत

जीवन का श्रम ताप हरो हे! सुख सुषुमा के मधुर स्वर्ण हे! सूने जग गृह द्वार भरो हे! लौटे गृह सब श्रान्त चराचर नीरव, तरु अधरों पर मर्मर, करुणानत निज कर पल्लव से विश्व...

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