Tagged: Shivmangal Singh Suman

चल रही उसकी कुदाली / शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ 0

चल रही उसकी कुदाली / शिवमंगल सिंह ‘सुमन’

हाथ हैं दोनों सधे-से गीत प्राणों के रूँधे-से और उसकी मूठ में, विश्वास जीवन के बँधे-से धकधकाती धरणि थर-थर उगलता अंगार अम्बर भुन रहे तलुवे, तपस्वी-सा खड़ा वह आज तनकर शून्य-सा मन, चूर है...

वरदान माँगूँगा नहीं – शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ 0

वरदान माँगूँगा नहीं – शिवमंगल सिंह ‘सुमन’

यह हार एक विराम है जीवन महासंग्राम है तिल-तिल मिटूँगा पर दया की भीख मैं लूँगा नहीं। वरदान माँगूँगा नहीं।। स्‍मृति सुखद प्रहरों के लिए अपने खंडहरों के लिए यह जान लो मैं विश्‍व...

मैं बढ़ा ही जा रहा हूँ – शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ 0

मैं बढ़ा ही जा रहा हूँ – शिवमंगल सिंह ‘सुमन’

मैं बढ़ा ही जा रहा हूँ, पर तुम्हें भूला नहीं हूँ। चल रहा हूँ, क्योंकि चलने से थकावट दूर होती, जल रहा हूँ क्योंकि जलने से तमिस्त्रा चूर होती, गल रहा हूँ क्योंकि हल्का...

तूफानों की ओर घुमा दो नाविक – शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ 0

तूफानों की ओर घुमा दो नाविक – शिवमंगल सिंह ‘सुमन’

तूफानों की ओर घुमा दो नाविक निज पतवार आज सिन्धु ने विष उगला है लहरों का यौवन मचला है आज हृदय में और सिन्धु में साथ उठा है ज्वार तूफानों की ओर घुमा दो...

मेरा देश जल रहा, कोई नहीं बुझानेवाला – शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ 0

मेरा देश जल रहा, कोई नहीं बुझानेवाला – शिवमंगल सिंह ‘सुमन’

घर-आंगन में आग लग रही। सुलग रहे वन -उपवन, दर दीवारें चटख रही हैं जलते छप्पर- छाजन। तन जलता है , मन जलता है जलता जन-धन-जीवन, एक नहीं जलते सदियों से जकड़े गर्हित बंधन।...

अंगारे और धुआँ – शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ 0

अंगारे और धुआँ – शिवमंगल सिंह ‘सुमन’

इतने पलाश क्यों फूट पड़े है एक साथ इनको समेटने को इतने आँचल भी तो चाहिए, ऐसी कतार लौ की दिन-रात जलेगी जो किस-किस की पुतली से क्या-क्या कहिए। क्या आग लग गई है...

हम पंछी उन्‍मुक्‍त गगन के – शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ 0

हम पंछी उन्‍मुक्‍त गगन के – शिवमंगल सिंह ‘सुमन’

हम पंछी उन्‍मुक्‍त गगन के पिंजरबद्ध न गा पाएँगे, कनक-तीलियों से टकराकर पुलकित पंख टूट जाऍंगे। हम बहता जल पीनेवाले मर जाएँगे भूखे-प्‍यासे, कहीं भली है कटुक निबोरी कनक-कटोरी की मैदा से, स्‍वर्ण-श्रृंखला के...

मैं अकेला और पानी बरसता है – शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ 0

मैं अकेला और पानी बरसता है – शिवमंगल सिंह ‘सुमन’

मैं अकेला और पानी बरसता है प्रीती पनिहारिन गई लूटी कहीं है, गगन की गगरी भरी फूटी कहीं है, एक हफ्ते से झड़ी टूटी नहीं है, संगिनी फिर यक्ष की छूटी कहीं है, फिर...

मिट्टी की महिमा – शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ 0

मिट्टी की महिमा – शिवमंगल सिंह ‘सुमन’

निर्मम कुम्हार की थापी से कितने रूपों में कुटी-पिटी, हर बार बिखेरी गई, किंतु मिट्टी फिर भी तो नहीं मिटी! आशा में निश्छल पल जाए, छलना में पड़ कर छल जाए सूरज दमके तो...

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