Tagged: Ramdhari Singh Dinkar

हो कहाँ अग्निधर्मा नवीन ऋषियों – रामधारी सिंह “दिनकर” 0

हो कहाँ अग्निधर्मा नवीन ऋषियों – रामधारी सिंह “दिनकर”

कहता हूँ¸ ओ मखमल–भोगियो। श्रवण खोलो¸ रूक सुनो¸ विकल यह नाद कहां से आता है। है आग लगी या कहीं लुटेरे लूट रहे? वह कौन दूर पर गांवों में चिल्लाता है? जनता की छाती...

कलम, आज उनकी जय बोल – रामधारी सिंह “दिनकर” 0

कलम, आज उनकी जय बोल – रामधारी सिंह “दिनकर”

जला अस्थियाँ बारी-बारी चिटकाई जिनमें चिंगारी, जो चढ़ गये पुण्यवेदी पर लिए बिना गर्दन का मोल कलम, आज उनकी जय बोल। जो अगणित लघु दीप हमारे तूफानों में एक किनारे, जल-जलाकर बुझ गए किसी...

बालिका से वधू – रामधारी सिंह “दिनकर” 0

बालिका से वधू – रामधारी सिंह “दिनकर”

माथे में सेंदूर पर छोटी दो बिंदी चमचम-सी, पपनी पर आँसू की बूँदें मोती-सी, शबनम-सी। लदी हुई कलियों में मादक टहनी एक नरम-सी, यौवन की विनती-सी भोली, गुमसुम खड़ी शरम-सी। पीला चीर, कोर में...

परिचय – रामधारी सिंह “दिनकर” 0

परिचय – रामधारी सिंह “दिनकर”

सलिल कण हूँ, या पारावार हूँ मैं स्वयं छाया, स्वयं आधार हूँ मैं बँधा हूँ, स्वप्न हूँ, लघु वृत हूँ मैं नहीं तो व्योम का विस्तार हूँ मैं समाना चाहता, जो बीन उर में...

आग की भीख – रामधारी सिंह “दिनकर” 0

आग की भीख – रामधारी सिंह “दिनकर”

धुँधली हुईं दिशाएँ, छाने लगा कुहासा, कुचली हुई शिखा से आने लगा धुआँ-सा। कोई मुझे बता दे, क्या आज हो रहा है; मुँह को छिपा तिमिर में क्यों तेज रो रहा है? दाता, पुकार...

निराशावादी – रामधारी सिंह “दिनकर” 0

निराशावादी – रामधारी सिंह “दिनकर”

पर्वत पर, शायद, वृक्ष न कोई शेष बचा, धरती पर, शायद, शेष बची है नहीं घास; उड़ गया भाप बनकर सरिताओं का पानी, बाकी न सितारे बचे चाँद के आस-पास । क्या कहा कि...

शक्ति और क्षमा – रामधारी सिंह “दिनकर” 0

शक्ति और क्षमा – रामधारी सिंह “दिनकर”

क्षमा, दया, तप, त्याग, मनोबल सबका लिया सहारा पर नर व्याघ्र सुयोधन तुमसे कहो, कहाँ, कब हारा? क्षमाशील हो रिपु-समक्ष तुम हुये विनत जितना ही दुष्ट कौरवों ने तुमको कायर समझा उतना ही। अत्याचार...

ध्वज-वंदना – रामधारी सिंह “दिनकर” 0

ध्वज-वंदना – रामधारी सिंह “दिनकर”

नमो स्वतंत्र भारत की ध्वजा, नमो, नमो! नमो नगाधिराज-शृंग की विहारिणी! नमो अनंत सौख्य-शक्ति-शील-धारिणी! प्रणय-प्रसारिणी, नमो अरिष्ट-वारिणी! नमो मनुष्य की शुभेषणा-प्रचारिणी! नवीन सूर्य की नई प्रभा, नमो, नमो! नमो स्वतंत्र भारत की ध्वजा, नमो,...

दिल्ली (कविता) – रामधारी सिंह “दिनकर” 0

दिल्ली (कविता) – रामधारी सिंह “दिनकर”

यह कैसी चांदनी अम के मलिन तमिस्र गगन में कूक रही क्यों नियति व्यंग से इस गोधूलि-लगन में ? मरघट में तू साज रही दिल्ली कैसे श्रृंगार? यह बहार का स्वांग अरी इस उजड़े...

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