Tagged: Narendra Vidyaniwas

प्रिये 0

प्रिये

तुम मेरे आकाश के सूरज के जैसे हो प्रिये! तुम मेरे अभिमान के ऊंचे हिमालय हो प्रिये! तुम मेरा विस्तार हो और मेरा आधार हो तुम मेरी कविता-कहानी लेखनी की धार हो संजिदा संजिवनी...

गीता 0

गीता

बचपन से पढ़ता आया हूँ गीता जैसे रट ली हो पहाड़े की तरह कभी मतलब नहीं समझा अर्थ जानता था, समझता नहीं था। अब जानने लगा हूँ दुनियादारी, समझता हूँ सही-गलत का फर्क आगे बढ़ाने...

मैं कौन हूँ 0

मैं कौन हूँ

मैं कौन हूँ, मैं कौन हूँ मैं ईश्वर हूँ, मैं ही ब्रह्मांड आदि -अनादि मैं, मैं ही अनंत मैं यहाँ-वहां हूँ, कण-कण मे हूँ जल, वायु, आकाश, पृथ्वी हर जीवन के रग-रग में हूँ मैं...

मैं तुम्हारा था नहीं 0

मैं तुम्हारा था नहीं

तुम मेरी होकर भी मेरी हो न पाई क्यों कभी मैं तुम्हारा था नहीं लेकिन तुम्हारा हूँ प्रिये! मौन होकर मैं सुनाता हूँ तुम्हे कुछ गीत मैं अनसुने कुछ राग लेकर गा रहा हूँ...

कवि और कविता 0

कवि और कविता

मैं कवि हूँ प्रेम के कुछ गीत गाता हूँ तुम कविता बन गयीं, जो गुनगुनाता हूँ प्रेम का आनंद हो या हो विरह की वेदना मेघदूतों ने सुनाई कालिदास की कल्पना चिरपुरातन गीत को...

रावण 0

रावण

जलता रावण पूछ रहा है धू-धू करके थूक रहा है मुझे जलाने तुम आये हो क्या साथ राम को लाये हो? एक राम भी नहीं भीड़ में स्वांग राम का धरते हो सब मुकुट...

मिस्टर विकास 0

मिस्टर विकास

ख़ुब सुनाई देता है अख़बारों में, टीवी में विज्ञापनों में, रेडियो पर पर दिखाई क्यों नहीं देता कहीं मिस्टर इन्डिया तो नहीं हो गया हमारा विकाश ? जो सिर्फ़ सुनाई देता है दिखाई नहीं...

घर की तलाश मे 0

घर की तलाश मे

कुछ सिक्कों की तलाश में दर दर भटकता हूँ लौट जब घर को आता हूँ घर की तलाश में, घर में भटकता हूँ । दीवारों, बन्द दरवाज़ों की क़ैद में गुमशुदा हवा ढूँढता हूँ...

जड़विहीन पौधा 0

जड़विहीन पौधा

बड़ा हो रहा हूँ, पर जड़ों से दूर क्यों हूँ दुविधा में हूँ …. मेरे भगवान ! अपने भगवान से दूर क्यों हूँ असुविधा में हूँ… बिना जड़ों का मैं – नवांकुर पौध! अपनी...

सीता 0

सीता

कभी रावण ले गया था सीता को अपने छल से, और छुड़ा लाने पर राम ने त्याग दिया था सीता को न्याय से, मर्यादा से……… तब सृष्टि में एक ही रावण था अब हर तरफ...

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