Tagged: Kavishala

एक में दो – गुलज़ार 0

एक में दो – गुलज़ार

एक शरीर में कितने दो हैं, गिन कर देखो जितने दो हैं। देखने वाली आँखें दो हैं, उनके ऊपर भवें भी दो हैं, सूँघते हैं ख़ुश्बू को जिससे नाक एक है, नथुने दो हैं।...

रिश्ते बस रिश्ते होते हैं – गुलज़ार 0

रिश्ते बस रिश्ते होते हैं – गुलज़ार

रिश्ते बस रिश्ते होते हैं कुछ इक पल के कुछ दो पल के कुछ परों से हल्के होते हैं बरसों के तले चलते-चलते भारी-भरकम हो जाते हैं कुछ भारी-भरकम बर्फ़ के-से बरसों के तले...

खुमानी, अखरोट! – गुलज़ार 0

खुमानी, अखरोट! – गुलज़ार

ख़ुमानी, अख़रोट बहुत दिन पास रहे थे दोनों के जब अक़्स पड़ा करते थे बहते दरिया में, पेड़ों की पोशाकें छोड़के, नंग-धड़ंग दोनों दिन भर पानी में तैरा करते थे कभी-कभी तो पार का...

अमलतास – गुलज़ार 0

अमलतास – गुलज़ार

खिड़की पिछवाड़े को खुलती तो नज़र आता था वो अमलतास का इक पेड़, ज़रा दूर, अकेला-सा खड़ा था शाखें पंखों की तरह खोले हुए एक परिन्दे की तरह बरगलाते थे उसे रोज़ परिन्दे आकर...

आम – गुलज़ार 0

आम – गुलज़ार

मोड़ पे देखा है वो बूढ़ा-सा इक आम का पेड़ कभी? मेरा वाकिफ़ है बहुत सालों से, मैं जानता हूँ जब मैं छोटा था तो इक आम चुराने के लिए परली दीवार से कंधों...

कुछ और मंजर-1 – गुलज़ार 0

कुछ और मंजर-1 – गुलज़ार

कभी कभी लैम्प पोस्ट के नीचे कोई लड़का दबा के पैन्सिल को उंगलियों में मुड़े-तुड़े काग़ज़ों को घुटनों पे रख के लिखता हुआ नज़र आता है कहीं तो.. ख़याल होता है, गोर्की है! पजामे...

वैन गॉग का एक ख़त / गुलज़ार 0

वैन गॉग का एक ख़त / गुलज़ार

तारपीन तेल में कुछ घोली हुई धूप की डलियाँ मैंने कैनवास में बिख़ेरी थीं मगर क्या करूँ लोगों को उस धूप में रंग दिखते ही नहीं! मुझसे कहता था थियो चर्च की सर्विस कर...

वो जो शायर था चुप सा रहता था – गुलज़ार 0

वो जो शायर था चुप सा रहता था – गुलज़ार

वो जो शायर था चुप-सा रहता था बहकी-बहकी-सी बातें करता था आँखें कानों पे रख के सुनता था गूँगी खामोशियों की आवाज़ें! जमा करता था चाँद के साए और गीली- सी नूर की बूँदें...

रात भर सर्द हवा चलती रही – गुलज़ार 0

रात भर सर्द हवा चलती रही – गुलज़ार

रात भर सर्द हवा चलती रही रात भर हमने अलाव तापा मैंने माजी से कई खुश्क सी शाखें काटीं तुमने भी गुजरे हुये लम्हों के पत्ते तोड़े मैंने जेबों से निकालीं सभी सूखीं नज़्में...

अफ़साने – गुलज़ार 0

अफ़साने – गुलज़ार

खुशबू जैसे लोग मिले अफ़साने में एक पुराना खत खोला अनजाने में जाना किसका ज़िक्र है इस अफ़साने में दर्द मज़े लेता है जो दुहराने में शाम के साये बालिस्तों से नापे हैं चाँद...

Please wait...

Never Miss Any Poetry, Join Our Family

Want to be notified when any New Poetry Published? Enter your email address and name below to be the first to know.