Tagged: Hindi Potry

बेखबर प्यार.. 0

बेखबर प्यार..

तुम सोंती रही बेखबर.. हम सारी रात जागते रहे .. तुमहे देखने की अरमान लिये .. नींद से दूर भागते रहे .. बिखेरी जब जब हावाओं ने जूल्फे तुम्हारी .. ज़िस्म से निकल आती...

अभी कहाँ मरा हूँ मैं 0

अभी कहाँ मरा हूँ मैं

बच्चा : माँ मुझे तू देख तो, अभी कहाँ मरा हूँ मैं, लड़ना अभी तो बाकी हैं, अभी कहाँ डरा हूँ मैं। ऐ माँ मुझको हिम्मत देना, मुझे तुझसे दूर जो रहना हैं, अभी...

मुलाकात 0

मुलाकात

“मैं जिंदगी की बात लिखता हूँ, अपने ख़यालात लिखता हूँ। यादों के घने बादल से आंसुओं की बरसात लिखता हूँ।   मैं लिखता हूँ, मसलकर हाथों में ठंड की गरमाहट, मेरे लबों पे तेरी...

उड़ गया वो पंछी 0

उड़ गया वो पंछी

छोड़ कर डाल उड़ गया वो पंछी नये ठिकाने की आस में नई राह, नई मंजिल और नये लोगों की तलाश में दरअसल उड़ना पसंद है उसे तो वो जल्दी थकता नहीं है राह...

इतनी आसानी से नही जा पाओगी 0

इतनी आसानी से नही जा पाओगी

चलो तुम गौर तो करती हो, मोहब्बत को छुपाकर, चुपके से जो निकल गयी, सीने से दिल चुरा कर !! तुम सोचती हो कभी सलाखों में नही आओगी, मुझसे नजरे फेर ख़यालो में नही...

बंटबारे की आँधी मैंने हर मौसम चलते देखी हैं 2

बंटबारे की आँधी मैंने हर मौसम चलते देखी हैं

-बंटबारे की आँधी मैंने हर मौसम चलते देखी हैं, राजनीति की भट्टी में सब सिकते देखा हैं। -कैसे रिश्ते रिश्तों से टकराते, कैसे कोई अपना हाथ छुड़ाता, वोटों की आँधी में मैंने सब उड़ते...

विजय – सुमित्रानंदन पंत 0

विजय – सुमित्रानंदन पंत

मैं चिर श्रद्धा लेकर आई वह साध बनी प्रिय परिचय में, मैं भक्ति हृदय में भर लाई, वह प्रीति बनी उर परिणय में। जिज्ञासा से था आकुल मन वह मिटी, हुई कब तन्मय मैं,...

चींटी – सुमित्रानंदन पंत 0

चींटी – सुमित्रानंदन पंत

चींटी को देखा? वह सरल, विरल, काली रेखा तम के तागे सी जो हिल-डुल, चलती लघु पद पल-पल मिल-जुल, यह है पिपीलिका पाँति! देखो ना, किस भाँति काम करती वह सतत, कन-कन कनके चुनती...

वायु के प्रति – सुमित्रानंदन पंत 0

वायु के प्रति – सुमित्रानंदन पंत

प्राण! तुम लघु लघु गात! नील नभ के निकुंज में लीन, नित्य नीरव, नि:संग नवीन, निखिल छवि की छवि! तुम छवि हीन अप्सरी-सी अज्ञात! अधर मर्मरयुत, पुलकित अंग चूमती चलपद चपल तरंग, चटकतीं कलियाँ...

आ: धरती कितना देती है – सुमित्रानंदन पंत 1

आ: धरती कितना देती है – सुमित्रानंदन पंत

मैने छुटपन मे छिपकर पैसे बोये थे सोचा था पैसों के प्यारे पेड़ उगेंगे , रुपयों की कलदार मधुर फसलें खनकेंगी , और, फूल फलकर मै मोटा सेठ बनूगा ! पर बन्जर धरती में...

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